
विवेकानंद कुशवाहा

कांस्टिट्यूशन क्लब के नतीजे के बाद से बहुतेरे लोग अमित शाह की औकात बताने में लगे हैं। खासकर ठाकुर बंधु। वे लोग भूल रहे हैं कि राजीव प्रताप रूडी 1999 से ही कांस्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया के सचिव हैं।
2009 में भी रूडी ने भाजपा के रामनाथ कोविंद को सचिव पद का चुनाव हराया था, जो बाद में देश के राष्ट्रपति बने। उस समय दिल्ली में अमित शाह नहीं थे। शाह जी के दिल्ली आने के बाद यह कांस्टिट्यूशन क्लब का तीसरा चुनाव था।
दरअसल, अब ठाकुर लॉबी मन-ही-मन योगी आदित्यनाथ को देश का अगला प्रधानमंत्री मान चुकी है। वहीं भाजपा की ‘पिछड़ा चेहरा पॉलिटिक्स’ की नीति से नाराज आरएसएस के कुछ लोग इसके लिए अमित शाह को जिम्मेवार मानते हैं।
ऐसे लोगों के लिए भाजपा के भीतर योगी की राह में एक ही रोड़ा दिख रहा है, वह हैं अमित शाह। यही कारण है कि अब अमित शाह भाजपा में जिस नेता के पीछे दिखेंगे, वह ठाकुर लॉबी और आरएसएस से जुड़े पिछड़ा विरोधी लॉबी के निशाने पर आ जायेगा।
अमित शाह जानते हैं कि भाजपा को अभी लंबा शासन करना है तो पिछड़े चेहरों को भी तैयार करते रहना होगा। क्योंकि, नरेंद्र मोदी सिर्फ हिंदुत्ववादी होने की वजह से देश के पिछड़ों/गरीबों में स्वीकार्य नहीं हुए। उनकी पिछड़ी जाति से होना उनके लिए सेफगार्ड और बड़ी जीत की वजह बनता रहा है।
जिस तरह नरेंद्र मोदी ने गरीब सवर्णों के लिए EWS रिजर्वेशन लागू किया और उसके बाद भी भाजपा पिछड़े, दलितों के वोट पाते रह गयी। अगर किसी सवर्ण वर्ग से आने वाले नेता ने यह आरक्षण लागू किया होता, तो फिर उसके नेतृत्व में भाजपा का चुनाव जीत पाना लगभग नामुमकिन हो जाता। अभी भी जो स्थिति है, उसमें जिस दिन नरेंद्र मोदी भाजपा के सीन से हटेंगे, भाजपा को सब साफ दिख जायेगा।
दरअसल, योगी आदित्यनाथ बहुसंख्य पिछड़ी आबादी के बीच कमोबेश एक्सपोज हो चुके हैं। उनका ठाकुरवाद किसी से छिपा नहीं है। यही कारण है कि योगी आदित्यनाथ को यूपी में सेफगार्ड देने के प्रयास खुद अमित शाह कर रहे हैं। अगर योगी से नाराज जाट, गुर्जर व पिछड़े वर्ग के नेताओं को शाह जी न साधें तो योगी महाराज की मुश्किलें अभी ही यूपी में बढ़ जायेंगी। इन सबके बावजूद भी अगर सपा अपने पीडीए के फॉर्मूले पर टिकी रही, तो 2027 में ही बहुत कुछ क्लियर हो जायेगा।
इसके बाद भी मान लेते हैं कि योगी महाराज 2027 का किला फतह कर लेते हैं और भाजपा से 2029 में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हो जाते हैं, तो भी उनके नेतृत्व में एनडीए का मौजूदा स्वरूप नहीं रह पायेगा।
कांस्टिट्यूशन क्लब मामले में यदि अमित शाह सच में रूडी की हार चाहते होते तो निशिकांत दुबे, रूडी के खिलाफ उस तरह का बयान कभी नहीं दे पाते। निशिकांत का बयान विपक्ष के लिए एक ट्रैप की तरह था कि भाजपा का उम्मीदवार संजीव बालियान है, जबकि दोनों ही भाजपा के ही उम्मीदवार थे।
सही मायने में देखें तो अमित शाह दोधारी राजनीति कर रहे हैं, उन्होंने 25 साल से सचिव की भूमिका निभा रहे रूडी को फिर से वही बनने पर भी बड़े वर्ग में सुपर हीरो बना दिया। विपक्ष की नजर में भी रूडी साहब की इमेज गुडी-गुडी हो गयी। इससे कुछ देर के लिए ही सही राजीव प्रताप रूडी को लेकर भविष्य के गीत गाये जाने लगे हैं।
इधर जगदीप धनखड़ साहब के इस्तीफे और सत्यपाल मलिक साहब के निधन से जाटों का बिगड़ा सेंटीमेंट संजीव बलियान के पक्ष में दिखने लगा है। संजीव बालियान को अभी भाजपा और आगे बढ़ाने जा रही है। यानी एक क्लब के चुनाव से भाजपा का दो नेता तैयार हो गया है, जो अब तक महज सांसद बने हुए थे।


