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गांधी-आंबेडकर मार्च से हुआ राहुल की मतदाता अधिकार यात्रा का समापन

by Dayanand Roy

महेश सिन्हा

इंडिया गठबंधन ने मार्च में दिखाई अपनी एकजुटता

पटना : लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में विशेष मतदाता पुनरीक्षण (एसआईआर) के खिलाफ 17 अगस्त से शुरु हुई ‘मतदाता अधिकार यात्रा’ का सोमवार को पटना में गांधी-आंबेडकर मार्च के साथ समापन हो गया।

गांधी मैदान स्थित महात्मा गांधी मूर्ति पर माल्यार्पण कर मार्च की शुरुआत हुई, जो हाईकोर्ट के निकट आंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर खत्म हुई। गांधी-आंबेडकर मार्च में राहुल गांधी के साथ हजारों समर्थकों ने पदयात्रा की।

इसमें  ‘इंडिया’ गठबंधन  में शामिल नौ दलों के नेताओं ने हिस्सा लिया। इनमें झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन,तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी, कर्नाटक  के उपमुख्यमंत्री डी शिवकुमार, राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, भाकपा महासचिव डी राजा,माकपा महासचिव एमए बेबी,भाकपा माले महासचिव  दीपांकर भट्टाचार्य शिवसेना उद्धव गुट के संजय राऊत , तृणमूल कांग्रेस सांसद  यूसुफ पठान और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की सुप्रिया सुले प्रमुख हैं। इनके  अलावा बिहार से राजद नेता तेजस्वी यादव,  वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी और कांग्रेस, भाकपा , माकपा तथा भाकपा माले के वरिष्ठ नेता व कार्यकर्ता भी इस मार्च  में शामिल थे।

गांधी मैदान के गेट नंबर एक से निकल कर  यह  मार्च एसपी वर्मा रोड होते हुए डाकबंगला चौराहा पहुंचा जहां इसे रोक दिया गया। वहां एक सभा हुई जिसे राहुल गांधी समेत गठबंधन के सभी दलों के नेताओं ने संबोधित किया। डाकबंगला चौराहा से राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे के साथ अन्य दलों के नेता एक गाड़ी पर सवार होकर हाईकोर्ट के पास  आंबेडकर पार्क गये और  वहां बाबा साहब  भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया।

इस मार्च के जरिए बिहार विधान सभा चुनाव से पहले इंडिया गठबंधन ने अपनी एकजुटता का भी प्रदर्शन किया।

इससे पूर्व राहुल गांधी के नेतृत्व में वोटर अधिकार यात्रा 15 दिनों में

करीब 1300 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए 24 जिलों और 50 विधानसभा क्षेत्रों से होकर गुजरी। इस दौरान राहुल गांधी ने भाजपा और चुनाव आयोग पर लगातार निशाना साधा और जनता को वोट चोरी के खिलाफ सजग रहने की अपील की।पूरी यात्रा के दौरान राहुल गांधी के साथ विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव,भाकपा-माले महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य,वीआईपी प्रमुख मुकेश  सहनी के अलावा भाकपा और माकपा के नेता मौजूद रहे।तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन  और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव  भी यात्रा में शामिल हो चुके हैं। 

सियासत के जानकारों का मानना है कि राहुल गांधी अपने मतदाता अधिकार यात्रा के माध्यम से राजद पर बराबरी का दर्जा देने का दबाव बना दिया है। दरअसल, विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 70 सीट की मांग कर रही है। लेकिन राजद 50-55 में ही निपटाना चाहती है। ऐसे में इस पदयात्रा में राहुल ने कांग्रेस का शक्ति प्रदर्शन किया है। राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार राहुल गांधी का मूल मकसद बिहार में कांग्रेस को स्थापित और मजबूत करने का है। यह बस कहने के लिए महागठबंधन की यात्रा थी, मगर् हकीकत में इस यात्रा को  कांग्रेस की दबाव की राजनीति के तहत माना जा रहा है। इस  यात्रा में महागठबंधन के अन्य दलों की भूमिका सिर्फ  अतिथि कलाकार की तरह रही।

जबकि मूल कार्यक्रम कांग्रेस तय करती रही और उसके हिसाब से ही अन्य दल एक्ट करते रहे। सियासत के जानकारों का कहना है कि राहुल गांधी तेजस्वी यादव की पिच पर  बैटिंग  कर गये।दरअसल वह सियासत को सड़क से सत्ता तक ले जाना चाहते हैं। वह बिहार में अपनी खोई हुई जमीन वापस लाना चाहते हैं। शायद यही कारण है कि राहुल गांधी ने अपनी यात्रा के दौरान तेजस्वी यादव का साथ तो लिया, लेकिन मुख्यमंत्री के तौर पर उनको पेश नही किया। जबकि तेजस्वी यादव ने उन्हें बतौर प्रधानमंत्री के रूप में पेश कर उन्हें अपने पक्ष में करने का भरपूर प्रयास किया। इस यात्रा के माध्यम से कांग्रेस ने दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक मतदाताओं को साधने की कोशिश की है।

हालांकि, कांग्रेस की हालिया स्थिति कमजोर रही है। पिछले तीन विधानसभा चुनावों में उसका वोट शेयर 10 फीसदी तक नहीं पहुंचा और लोकसभा में भी प्रदर्शन कुछ खास नहीं रहा। लेकिन, राहुल गांधी ने प्रदेश नेतृत्व में बदलाव कर दलित और पिछड़े वर्ग को प्रतिनिधित्व देकर नई ऊर्जा पैदा की है। जानकारों की मानें तो इस पूरी यात्रा में भले ही महागठबंधन साथ दिखी हो, मगर यह राजद के लिए बड़ी चुनौती है।

सबसे बड़ा मामला सीट शेयरिंग का है। कांग्रेस ने पिछले चुनाव में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया था। इसके चलते राजद यह आरोप लगाती है की उनकी सरकार नहीं बन पाई। बता दें कि इस यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने देसी अंदाज अपनाया। कभी बुलेट चलाते, कभी खेतों में उतरकर किसानों से बातचीत करते और गमछा लहराकर लोगों से जुड़ते नजर आए।

तेजस्वी यादव के साथ मिलकर उन्होंने मतदाता सूची से नाम काटने और वोट चोरी के मुद्दे को बड़े पैमाने पर उठाया। प्रियंका गांधी ने भी यात्रा में शामिल होकर महिलाओं और ब्राह्मण बहुल मिथिला क्षेत्र में कांग्रेस को मजबूत करने का प्रयास किया। इस यात्रा के दौरान कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं ने अपनी उपस्थिती दर्ज कराई।

उल्लेखनीय है कि पहले इस यात्रा का समापन एक सितंबर  को गांधी मैदान  में  एक रैली से होना था, जिसे बाद में बदल दिया गया। कांग्रेस की ओर से रैली के दिन गांधी मैदान नहीं उपलब्ध हो पाने के कारण यह फैसला लेने की बात कही गई है।

वे समय रहते गांधी मैदान को आवंटित नहीं करा पाए। इसके बाद उन्होंने पटना के अन्य मैदान जैसे वेटनरी कॉलेज ग्राउंड या मिलर ग्राउंड का आवंटन  कराने के बजाय रैली की जगह पदयात्रा करने का निर्णय लिया गया। दरअसल अब अगर पटना में रैली होती तो उन्हीं जिलों से भीड़ को फिर से जुटा पाना संभव नहीं हो पाता। इससे रैली में भीड़ कम होने का डर था और अगर ऐसा होता तो अच्छा संदेश नहीं जाता।

लेखक बिहार में न्यूजवाणी के संपादक हैं।

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