हर साल 9 अगस्त को पूरी दुनिया में विश्व आदिवासी दिवस यानी अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस मनाया जाता है. यह दिन आदिवासी समुदायों के अधिकारों, उनकी संस्कृति, परंपराओं और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े मुद्दों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए समर्पित है. आदिवासी समाज की जीवनशैली लंबे समय से जंगल और प्रकृति से गहराई से जुड़ी रही है.
जंगलों की कटाई से बढ़ी चुनौतियां
आदिवासी समुदायों के सामने आज सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों के साथ-साथ अपने प्राकृतिक आवास को बचाने की भी बड़ी चुनौती है. जंगलों की लगातार कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के बढ़ते दोहन का सीधा असर उनके जीवन पर पड़ता है. जंगल उनके लिए सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि आजीविका, संस्कृति और परंपराओं का भी महत्वपूर्ण आधार हैं.
संयुक्त राष्ट्र से जुड़ा है दिवस का इतिहास
विश्व आदिवासी दिवस के इतिहास की बात करें तो संयुक्त राष्ट्र के स्तर पर आदिवासी समुदायों के अधिकारों को लेकर लंबे समय से प्रयास होते रहे हैं. वर्ष 1982 में संयुक्त राष्ट्र के आदिवासी आबादी से जुड़े कार्यकारी समूह की पहली बैठक हुई थी. इसके बाद दिसंबर 1994 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 9 अगस्त को अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की.
झारखंड में आदिवासी आबादी का बड़ा हिस्सा
भारत में झारखंड आदिवासी समुदायों की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत वाला प्रमुख राज्य है. 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की करीब 26 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जनजाति से संबंधित थी. झारखंड में बिरहोर, पहाड़िया, माल पहाड़िया, कोरबा, बिरजिया, असुर, सबर और खड़िया समेत कई जनजातीय समुदाय रहते हैं.
संरक्षण और अधिकारों पर जोर
विश्व आदिवासी दिवस केवल आदिवासी संस्कृति का उत्सव नहीं है, बल्कि उनके अधिकारों, सम्मान और विकास पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर भी है. इस दिन आदिवासी भाषाओं, परंपराओं, लोककला और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की जरूरत पर चर्चा होती है. विकास के साथ उनकी पहचान और प्रकृति से जुड़े अधिकारों की रक्षा करना भी उतना ही जरूरी है.
