स्क्रीन टाइम का खतरा: क्या जेन जी की घट रही है सोचने-समझने की ताकत?

Dayanand Roy
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स्क्रीन टाइम बनी डिजिटल लत

दशकों तक बेहतर शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं के कारण इंसानी आईक्यू लगातार बढ़ता रहा, जिसे वैज्ञानिक ‘फ्लिन इफेक्ट’ कहते हैं। लेकिन अब नई पीढ़ी यानी जेन जी में बुद्धिमत्ता, याददाश्त और समस्या सुलझाने की क्षमता में गिरावट दर्ज की जा रही है।

 स्क्रीन टाइम बना सबसे बड़ा कारण

करीब 80 देशों के आंकड़ों के विश्लेषण के अनुसार, 2010 के बाद बच्चों की बौद्धिक क्षमता तेजी से घटी है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल तकनीक और मोबाइल स्क्रीन पर बढ़ती निर्भरता इसका प्रमुख कारण है।

 रील्स और शॉर्ट्स से नहीं होती गहरी सीख

विशेषज्ञों के मुताबिक मानव मस्तिष्क छोटे वीडियो और संक्षिप्त कंटेंट से प्रभावी ढंग से सीखने के लिए विकसित नहीं हुआ है। गहराई से पढ़ाई, किताबें और आमने-सामने की बातचीत ही बेहतर सीखने और सोचने की क्षमता विकसित करती हैं।

 तकनीक ने बढ़ाया अति-आत्मविश्वास

रिपोर्ट बताती है कि जेन जी के कई युवा खुद को तकनीकी रूप से बेहद सक्षम मानते हैं, लेकिन यही तकनीक उनकी तार्किक सोच, विश्लेषण क्षमता और मानसिक विकास को धीरे-धीरे प्रभावित कर रही है।

 दुनिया के कई देशों ने उठाए सख्त कदम

बढ़ते खतरे को देखते हुए स्वीडन ने स्कूलों में डिजिटल गैजेट्स हटाकर कागज-कलम और प्रिंटेड किताबों को फिर से अपनाया है। वहीं फ्रांस, नीदरलैंड, ब्रिटेन और फिनलैंड जैसे देश भी स्कूलों में टैबलेट और लैपटॉप के इस्तेमाल को सीमित कर रहे हैं। यूनेस्को ने भी चेतावनी दी है कि तकनीक का उपयोग तभी लाभदायक है, जब वह वास्तविक सीखने में मदद करे।

 किताबों की ओर लौटना क्यों है जरूरी

विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार फोन स्क्रॉल करने की आदत युवाओं की एकाग्रता, मानसिक स्वास्थ्य और सीखने की क्षमता को कमजोर कर रही है। यदि समय रहते स्क्रीन टाइम सीमित कर पढ़ने की आदत नहीं अपनाई गई, तो आने वाली पीढ़ियों की बौद्धिक क्षमता पर इसका गंभीर असर पड़ सकता है।

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