स्वास्थ्य, समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक धनतेरस का पर्व 18 अक्टूबर को

Dayanand Roy
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रांची : धनतेरस का पर्व कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को आता है और दीपावली के पांच दिवसीय उत्सव की शुरुआत करता है। धनतेरस को “धनत्रयोदशी” भी कहा जाता है। इस वर्ष त्रयोदशी तिथि 18 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 18 मिनट से प्रारंभ हो रहा है जो 19 अक्टूबर रविवार को दोपहर 1 बजकर 51 मिनट तक रहेगी।

ऐसे में धनतेरस का पर्व 18 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इस दिन को स्वास्थ्य, समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व विशेष रूप से धन (संपत्ति) और आरोग्य (स्वास्थ्य) की प्राप्ति के लिए मनाया जाता है। इस दिन धन के देवता कुबेर, स्वास्थ्य के देवता धन्वंतरि और मां लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व है।

मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसलिए यह दिन आयुर्वेद और आरोग्य के प्रतीक धन्वंतरि जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। एक अन्य कथा के अनुसार, राजा ह्यम के पुत्र की अल्पायु भविष्यवाणी को उसकी पत्नी की चतुराई और दीपों की रौशनी ने बदल दिया था।

इसलिए इस दिन दीपदान और यमराज के लिए दीपक जलाने की परंपरा भी है। धनतेरस के दिन लोग नए बर्तन, धातु (सोना-चांदी), जेवरात, इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएँ, वाहन, आदि खरीदते हैं। यह विश्वास है कि इस दिन खरीदी गई वस्तुएं घर में समृद्धि और शुभता लाती हैं। साथ ही, व्यापारी वर्ग इस दिन को नए खाता-बही की शुरुआत के रूप में भी मनाता है।

इस दिन धन्वंतरि जी की पूजा के साथ-साथ घर के मुख्य द्वार पर रंगोली, दीप और तोरण से सजावट की जाती है। संध्या के समय यमराज के नाम एक दीपक घर के बाहर दक्षिण दिशा में जलाना विशेष फलदायक माना गया है। इसे यम दीपदान कहते हैं।आज के दौर में धनतेरस केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव का स्वरूप भी बन चुका है।

यह दिन स्मार्ट खरीदारी और वित्तीय निवेश का प्रतीक बन गया है। लोग इस दिन स्वास्थ्य बीमा, सोना-चांदी के सिक्के, और दीर्घकालीन निवेश करते हैं।धनतेरस केवल धन की पूजा का पर्व नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा को जीवन में आमंत्रित करने का प्रतीक है।

यह दिन हमें यह भी सिखाता है कि धन का उपयोग समाज और परिवार के कल्याण के लिए कैसे किया जाए। धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक परंपरा और आधुनिक सोच का संगम बन चुका धनतेरस आज भी भारतीय जनमानस में विशेष स्थान रखता है।

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