1400 वर्ष पुराना है मुड़मा मेला, मेले में मिलते हैं पारंपरिक सामान

Dayanand Roy
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पूरे क्षेत्र के लिए आर्थिक धुरी का काम करता है मेला

रांची : मांडर का मुड़मा मेला लगभग 1400 वर्ष पुराना है। ऐसी मान्यता है कि रोहतासगढ़ से जब उरांव जनजाति आयी थी, तब उनके साथ मुंडा जनजाति समुदाय का सांस्कृतिक समझौता इसी स्थल पर हुआ था।

इनके बीच क्षेत्र का विभाजन भी यहीं हुआ था। तभी से इस सांस्कृतिक समझौते की याद में मुड़मा मेला का आयोजन किया जा रहा है।  यह मेला विभिन्न जनजातियों विशेषकर उरांव जो अनेक समय कालों में झारखंड के है अलग-अलग क्षेत्रों में है या दूसरे क्षेत्रों में रोजगार या अन्य कारणों से चले गए हैं वे इस जतरा के समय सभी एक दूसरे से मिलते हैं।

बड़े पैमाने पर पारंपरिक समान, पइला, जाल, तलवार ,बर्तन श्रृंगार के सामान, खिलौने, कपड़े एवं अन्य अन्य जनजातीय समाज की उपयोगी सामान यहां पर मिलता है। जिसका लोग साल भर इंतजार करते हैं।  

यह जतरा पूरे क्षेत्र का आर्थिक धुरी का काम करता है, बड़े पैमाने पर मनोरंजन के लिए झूले अन्य कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं जिससे बड़े पैमाने पर लोग प्रत्यक्ष परोक्ष रूप से रोजगार के साधन प्राप्त करते हैं ।

इस तरह यह मुड़मा जतरा सांस्कृतिक विरासत के प्रति अपनी संस्कृति के संरक्षण के लिए एक मंच का प्रदान करता है विभिन्न विद्वानों को संस्कृति के विषय में बताने के लिए मंच प्रदान करता है।

रोजगार के साधन उपलब्ध कराने के लिए और जनजातीय संस्कृति विशेषकर उरांव के संवर्धन और नई पीढ़ी को अपने संस्कृति के प्रति लगाव रखने और उसे संरक्षित करने का संदेश देती है।

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