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एक शांतिप्रिय, सहिष्णु, प्रबुद्ध और सेवाभावी समुदाय है ईसाई

by Dayanand Roy

सुशोभित

भारत में अल्पसंख्यक समुदाय की बात करते समय मुसलमानों की जितनी चर्चा की जाती है, उतनी ईसाइयों की नहीं होती। जबकि देश में ईसाइयों की आबादी 3 से साढ़े 3 करोड़ के आसपास है। नगालैंड, मिजोरम, मेघालय में ईसाई बहुसंख्यक हैं। केरल, गोवा, तमिलनाडु, म​णिपुर आदि में भी उनकी बड़ी संख्या है। किन्तु उत्तर भारत में उनकी संख्या कम होने से वे राजनैतिक समीकरणों का हिस्सा नहीं बन पाते या अधिक चर्चाओं में नहीं आ पाते।

यह एक शांतिप्रिय, सहिष्णु, प्रबुद्ध और सेवाभावी समुदाय है। भारत में ईसाइयों की कम संख्या होने के बावजूद यहाँ के स्कूलों, कॉलेजों और अस्पतालों में इस समुदाय के द्वारा निभाई जा रही महत्त्वपूर्ण भूमिका की उपेक्षा नहीं की जा सकती। तथ्य यह है कि भारत के 10 में से 7 धार्मिक अल्पसंख्यक स्कूल ईसाई समुदाय के द्वारा संचालित हैं और इसके बावजूद इन संस्थानों में पढ़ने वाले 4 में से 3 छात्र गैर-ईसाई हैं। वहाँ पर ईसाई थियोलॉजी की नहीं, आधुनिक विश्व के लिए ज़रूरी मूल्यों और विद्याओं की ही शिक्षा दी जाती है।

ईसाइयों के सौन्दर्यबोध (क्रिश्चियन एस्थेटिक्स) में सरलता, सादगी और स्वच्छता का बड़ा महत्त्व है। गिरजाघरों में भी प्राय: यही अनुभूति होती है- कोई शोर-शराबा, ढोंग-आडम्बर नहीं। उनकी प्रार्थनाएँ भी मौन और विनम्रता से भरी हुई होती हैं, किसी को प्रभावित करने या अपने वर्चस्व का प्रदर्शन करने की भौंडी लिप्सा से भरी नहीं। ईसाइयों के इने-​गिने त्योहार भी चुपचाप आकर चले जाते हैं, और हमारे जीवन में कोई दख़ल नहीं देते।

किन्तु हिन्दुत्व की विचारधारा ऐतिहासिक रूप से मुसलमानों और कम्युनिस्टों के साथ ही ईसाइयों को भी भारत का आंतरिक शत्रु समझती रही है और उनके प्रति क्रूर है। धर्मांतरण से इस विचारधारा को विशेष बेचैनी होती है, जबकि अगर कोई व्यक्ति स्वेच्छा से, किसी के दबाव में नहीं आकर, अपना धर्म परिवर्तित करता है तो इसे उसकी आज़ादी है।

संविधान का अनुच्छेद 25 भी स्वेच्छा से धर्म बदलने के व्यक्ति के अधिकार की रक्षा करता है। बाबासाहेब आम्बेडकर और उनके समर्थकों ने भी स्वेच्छा से बौद्ध धर्म को अपना लिया था।

क्रिसमस का त्योहार भारत में लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बन चुका है। एक सेकुलर त्योहार के रूप में इसकी लोकप्रियता इन अर्थों में आश्चर्यजनक है कि बड़े पैमाने पर ग़ैर-ईसाई हिन्दू भी इसे मनाते हैं, गिरजाघरों में मोमबत्तियां लेकर जाते हैं, कॉर्पोरेट ऑफिसों में क्रिसमस पर विशेष आयोजन किए जाते हैं, शॉपिंग मॉल और बाज़ार विशेष थीम्स में सजते हैं, ग्रीटिंग कार्ड्स और दूसरे सजावटी सामान ख़रीदे-बेचे जाते हैं।

किसी दूसरे धर्म के त्येाहार के लिए साधारणजन में ऐसा उत्साह साधारण बात नहीं। हिन्दुत्व की विचारधारा इससे जलती-भुनती है। नतीजतन, कट्टरवादी लोग इस दिन तुलसी पूजन दिवस मनाने का ढोंग करते हैं और अपने बच्चों को यह पट्टी पढ़ाते हैं कि यह हमारा त्योहार नहीं है।

हाल के दिनों में गिरजाघर के सामने हनुमान चालीसा के पाठ, बच्चों को सांता क्लॉज़ की पोशाक आदि पहनने से रोकने की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ भी सामने आई हैं। यह बताता है कि ये कुंदज़ेहन लोग किस तरह का कठमुल्ला-छाप देश बनाना चाहते हैं।

यही हाल मुसलमानों का है। पश्चिमी जगत में अनेक मुसलमान भी क्रिसमस के प्रति विरोध का रुख़ अपनाए रहते हैं। इंग्लैंड में खेलने वाले प्रसिद्ध फ़ुटबॉलर मोहम्मद सालाह के द्वारा अपने परिवार के साथ क्रिसमस मनाए जाने पर लाखों मुसलमानों द्वारा उनका मखौल उड़ाया जाता है, अप्रिय टिप्पणियाँ की जाती हैं। हाल ही में ब्रसेल्स के क्रिसमस मार्केट में मुसलमानों के विरोध-प्रदर्शन की ख़बर आई।

जबकि इस्लाम में जीसस क्राइस्ट को अल्लाह का रसूल माना गया है और उनकी सेकंड-कमिंग की बात भी कही गई है। कहते हैं कि मदीने में पैग़म्बर मोहम्मद की क़ब्र के पास एक जगह हज़रत ईसा इब्ने-मरयम के लिए भी ख़ाली छोड़ी गई है।

लेकिन मुसलमानों को इस बात से ऐतराज़ है कि ईसाई लोग जीसस क्राइस्ट को ईश्वर का पुत्र समझते हैं और ईश्वर की ही तरह पूजते हैं। मुसलमानों के लिए यह कुफ्र और शिर्क़ है। हम जो मानते हैं, वही सही है और पूरी दुनिया उसी को माने- इस मज़हबी जिद ने दुनिया में संघर्ष की अनेक स्थितियाँ रची हैं।

लेकिन हमें डॉग्मैटिक रिलीजन और पॉपुलर कल्चर के भेद को समझना होगा। रूढ़िवादी धर्म एक अभिशाप हैं, लेकिन लोकप्रिय संस्कृति मनुष्य के मन में निहित उल्लास की अभिव्यक्ति है। मैं स्वयं दीपावली पर नए वस्त्र पहनकर दीपक जलाता हूँ, भले लक्ष्मी की पूजा ना करूँ। जीसस क्राइस्ट ईश्वर के पुत्र हैं या नहीं, यहाँ यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण नहीं है, महत्त्व इस बात का है कि वे दुनिया में प्रेम, करुणा और सेवा का जो संदेश लेकर आए हैं, उसे हम अपने आचरण में कितना ढालते हैं। ये विधर्मी मूल्य नहीं, मानुष-धर्म के सार्वभौमिक मानदण्ड हैं।

हिन्दुत्व की राजनीति का मुसलमानों के प्रति द्वेष तो जगजाहिर है ही, ईसाइयों के लिए उनकी घृणा भी कुछ कम नहीं है। इनके द्वारा क्रिसमस डे को ‘गुड गवर्नेंस डे’ में बदलने की कोशिश की गई है, ताकि इस त्योहार का महत्त्व कम करके इस दिन के सार्वजनिक अवकाश को रद्द करवाया जा सके। विदेशी अंशदान (नियमन) अधिनियम यानी एफ़सीआरए का इस्तेमाल विशेष रूप से ईसाई समुदाय द्वारा संचालित संस्थानों को निशाना बनाने के लिए किया गया है।

संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 25 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाले धर्मांतरण-विरोधी क़ानूनों को अनेक राज्यों में बढ़ावा दिया गया है। ईसाइयों के ख़िलाफ़ हिंसा की घटनाएँ बढ़ी हैं। ट्राइबल राइट्स एक्टिविस्ट फ़ादर स्टैन स्वामी की कहानी तो सबको पता ही है, जिन्हें 83 साल की उम्र में यूएपीए के तहत गिरफ़्तार कर लिया गया और सज़ा के दौरान ही उनकी मृत्यु हो गई। फिर 1999 में ग्राहम स्टेंस और उनके दो बच्चों की निर्मम हत्या की चर्चा क्या ही छेड़ें?

हाल ही में भाजपा शासित छत्तीसगढ़ के दुर्ग में भी केरल मूल की दो ननों को झूठे आरोप में हिरासत में ले लिया गया था। वर्षों से आदिवासी ईसाइयों की ‘घर वापसी’ वनवासी कल्याण केंद्रों का कार्यक्रम रहा है, ताकि मिशनरियों द्वारा आदिवासियों के ईसाई धर्मांतरण का जवाब दिया जा सके। जबकि किसी मनुष्य की नि:संकोच सेवा करने के लिए पहले आपमें छुआछूत और जातीय श्रेष्ठता के दम्भ का शून्य हो जाना ज़रूरी है। ईसाइयों में ये गुण अगर हैं तो आपको इससे समस्या क्यों होती है?

जीसस क्राइस्ट के प्रति अपने झुकाव को मैंने कभी छुपाया नहीं और अतीत में क्रिश्चियन प्रतीकों पर कई बार लिखा है। जीसस को मैं ईश्वरीय या दैवीय अवतार नहीं, बल्कि एक सुंदर मनुष्य की तरह देखता हूँ और उनसे अच्छे मूल्य सीखने का प्रयास करता हूँ। जीसस क्राइस्ट का जन्म 25 दिसम्बर को हुआ था या नहीं, या वे ईश्वर के पुत्र थे या नहीं, इससे अधिक मानवता के प्रति उनका संदेश महत्त्वपूर्ण है। यही कारण है कि मैं क्रिसमस के इस सुंदर पर्व के अवसर पर न केवल ईसाई समाज के अपने मित्रों, बल्कि मनुष्यता के हित में खुली सोच रखने वाले अपने पाठकों को भी शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ!

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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