अंबेडकर से आदिवासी ग्राम व्यवस्था की अनदेखी हुई?

Dayanand Roy
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सुधीर पाल

भारतीय संविधान के निर्माण के समय जब भारत अपने भविष्य की नींव रख रहा था, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक था कि लोकतंत्र की जड़ें कितनी गहरी और कितनी विकेंद्रित होंगी। संविधान सभा में बाबा साहेब अंबेडकर ने ग्राम स्वराज या पंचायती व्यवस्था के प्रति स्पष्ट विरोध जताया था। उनका कहना था-‘इन गांवों में कुछ भी आदर्श नहीं है। ये लोग जातिगत भेदभाव, छुआछूत और सामाजिक अत्याचार के केंद्र हैं। गांव भारत की विकृति का स्रोत हैं, न कि उसकी शक्ति का।‘

कई विचारकों और आलोचकों का मानना है कि अंबेडकर ने पंचायतों का विरोध करते समय आदिवासी ग्राम व्यवस्था की वास्तविकता को नज़रअंदाज़ किया। समता, संवाद और सामूहिकता पर आधारित आदिवासी गांवों की स्वायत्त और लोकतांत्रिक शासनतंत्र की संरचना से संभवत: वे परिचित नहीं थे, या उसका मूल्यांकन उनकी प्राथमिकताओं में नहीं था।

अंबेडकर ने संविधान सभा में पंचायतों को संविधान का अनिवार्य हिस्सा बनाने का विरोध किया। अंततः, पंचायतों को संविधान के नीति निदेशक तत्वों के तहत अनुच्छेद 40 में स्थान मिला, न कि मूल अधिकारों या प्रशासनिक ढांचे में। इसका अर्थ था कि पंचायतों की स्थापना राज्य सरकारों की इच्छा पर निर्भर रहेगी, और यह बाध्यकारी नहीं होगी। यह परंपरागत स्वशासन व्यवस्था को संवैधानिक दर्ज़ा दिए जाने के ऐतिहासिक पहल की भ्रूण हत्या थी।

क्या अंबेडकर आदिवासी ग्राम व्यवस्था को समझ सके?

आदिवासी समाज परंपरागत रूप से वर्णाश्रम व्यवस्था से बाहर रहा है। वहाँ जातिगत ऊँच-नीच की भावना नहीं है, बल्कि समता, सामूहिकता और श्रम के आधार पर सम्मान का बोध होता है। ग्राम सभा वहाँ न सिर्फ निर्णय लेती है, बल्कि विवाद निपटारे से लेकर सामाजिक सुरक्षा तक का केंद्र होती है। उदाहरण के लिए झारखंड के हो, मुंडा, संथाल, उरांव, बिरहोर सहित लगभग सभी समुदायों की सामूहिक हित और न्याय पर आधारित पारंपरिक ग्राम व्यवस्था यथा मुंडा-मानकी, महतो, पड़हा, मांझी, पाहन, मांझी हाड़ाम, परगनैत, माझी परगना जीवंत हैं और सामाजिक तथा कानूनी मान्यता है। आदिवासी ग्राम व्यवस्था का आधार भूमि, जल, जंगल पर सामूहिक स्वामित्व है। यह उस निजी संपत्ति आधारित ग्राम व्यवस्था से भिन्न है जिस पैरोकार अंबेडकर थे।

महात्मा गांधी ने जहाँ ग्राम स्वराज और पंचायतों को भारतीय लोकतंत्र की आत्मा माना, वहीं अंबेडकर ने इसे सामाजिक अन्याय का स्रोत बताया। गांधी का मानना था कि गाँव आत्मनिर्भर और लोकतांत्रिक इकाई हो सकते हैं, जबकि अंबेडकर ने इसे ‘अतीत की कुरीतियों का गढ़’ कहा। हालाँकि अंबेडकर ने आदिवासी पंचायतों का प्रत्यक्ष उल्लेख कम किया लेकिन उन्होंने आदिवासी क्षेत्रों के लिए अलग प्रशासनिक व्यवस्था, विशेष सुरक्षा और विकास आयोग की वकालत की थी। उनका मानना था कि आदिवासी समाज को मुख्यधारा की जातिवादी राजनीति से बचाकर, उन्हें स्वायत्तता और संरक्षण मिलना चाहिए।

संविधान सभा में जयपाल सिंह मुंडा जैसे नेता आदिवासियों की आवाज बने थे। उन्होंने कहा था कि हम आदिवासी भारतीय सभ्यता के पहले नागरिक हैं, और हमारी सामाजिक संरचना भारत के संविधान की आत्मा के अधिक निकट है। यह वक्तव्य अंबेडकर की ग्राम व्यवस्था की आलोचना के बिलकुल विपरीत खड़ा होता है।

ऐतिहासिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य

संविधान सभा की बहस में अधिकांश सदस्यों का आग्रह था कि ग्राम स्वराज की पुरानी परंपरा के अनुसार देश के प्रशासन को चलाने का प्रावधान किया जाए। अंबेडकर ने व्यंग्य किया कि ऐसा प्रतीत होता है कि इन कथित बुद्धिजीवियों का ग्रामीण प्रेम सर चार्ल्स मेटकॉफ के भारत के गाँवों का वर्णन से प्रभावी है। अंबेडकर ने कहा कि भारतीय गाँवों ने भले ही विदेशी आक्रमणकारियों के हमले झेले होंगे, परंतु उन्होंने लगभग शुतुरमुर्ग की प्रवृत्ति का परिचय दिया और किसी तरह जीवित रहे भर हैं। अंबेडकर ने बेलाग होकर यह कहा कि यह कथित ग्रामीण गणतंत्र भारत की बरबादी रहे हैं।

अंबेडकर का ग्राम पंचायतों पर विरोध के संदर्भ और कारण जातिगत उत्पीड़न थे। गाँवों में दलितों के साथ अपमानजनक व्यवहार, मंदिर प्रवेश निषेध, कुओं से पानी न भरने देना जैसी घटनाएं आम थीं। ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का ग्राम व्यवस्था में सामंती वर्चस्व बना रहता था। जातिगत श्रेणीकरण के कारण सामाजिक समानता असंभव लगती थी। शोषण की संरचना में ज़मींदार, मुखिया या पाटिल के रूप में ऊँची जातियों का वर्चस्व था, जिससे निम्न जातियों को न्याय नहीं मिलता था। बाबा साहेब को भरोसा नहीं था कि पारंपरिक पंचायतें नए संविधान द्वारा दिए गए मूल अधिकारों का सम्मान करेंगी। लेकिन क्या यह मूल्यांकन आदिवासी गाँवों पर भी लागू होता था? क्या अंबेडकर आदिवासी ग्राम व्यवस्था को समझ सके?

अंबेडकर ने आदिवासी विद्रोहों के इतिहास को लगभग नजर अंदाज कर दिया अन्यथा वे ‘शुतुरमुर्ग’ का उदाहरण नहीं देते। बिरसा मुंडा के उलगुलान में या संथाल हूल में या ऐसे ही दर्जनों विद्रोहों में आदिवासी ग्राम व्यवस्था की केन्द्रीय भूमिका रही है। ‘कब लड़ाई शुरू होगी, बता दूंगा. अब से गाँव-गाँव में सब तीर पठाओ। पत्ता मिले तो समझना कि धर्म की बात सुनने को बुलाया है। तीर भेजने से समझना कि मैं लड़ने के लिए बुला रहा हूँ।’  (जंगल के दावेदार, महाश्वेता देवी, पृष्ट सं 104)   

डॉक्टर अल्तेकर ने ‘स्टेट एण्ड गवर्नमेंट इन ऐंशियेंट इण्डिया’ में लिखा है कि ‘अति प्राचीनकाल से ही भारत में प्रशासन की धुरी गाँव रहे हैं।… इसमें सन्देह नहीं कि गाँव ही सामाजिक जीवन के केन्द्रबिन्दु और देश की अर्थव्यवस्था के प्रधान इकाई थे। राष्ट्रीय संस्कृति,समृद्धि और प्रशासन का भव्य भवन इन्हीं पर खड़ा था, इनसे ही इनको संबल प्राप्त होता था।‘ (पृष्ठ २२५)।

 श्री श्रीमन्नारायण ने अपने ‘गान्धीयन कांस्टीट्यूशन’ के पृष्ठ ४६-४७ में सर चार्ल्स ट्रेवलीन लिखते हैं- ‘एक के बाद एक विदेशी आक्रमण-कारी भारत में आते और जमते रहे, किन्तु कुश की भाँति ग्राम-पालिका-समितियाँ अपने स्थान पर डटी रहीं ।’ सर जॉर्ज बर्डउड ने लिखा है कि संसार के किसी भी देश में भारत जितनी धार्मिक और राजनीतिक क्रान्तियाँ नहीं हुई हैं, फिर भी ग्राम-समितियों के कार्यों पर कोई आँच नहीं आयी । वे समग्र देश में सदा की भाँति एकरस स्थानीय हित के कार्यों में लगी रहीं।

चार दशक बाद संवैधानिक दर्ज़ा

संविधान सभा में अम्बेडकर के विरोध के चलते लगभग समझौते के तौर पर पंचायतों को राज्य के नीति निर्देश तत्वों में शामिल किया गया। अंबेडकर के नजरिए को ठीक करने में लगभग चार दशक लग गए। 1992 में 73वें संविधान संशोधन के बाद पंचायतों को संवैधानिक दर्जा मिला और 1996 में अनुसूचित क्षेत्रों (आदिवासी क्षेत्रों) के लिए विशेष प्रावधान किए गए। इससे आदिवासी ग्राम व्यवस्था को कानूनी मान्यता और अधिकार मिले। आदिवासी ग्राम व्यवस्था की ताकत सामूहिक निर्णय, सामाजिक समरसता,पारदर्शिता, महिलाओं की भागीदारी, स्थानीय विवादों का त्वरित समाधान और प्राकृतिक संसाधनों के सामूहिक प्रबंधन का कर्तव्य है।

संविधान की आत्मा समता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व है और आदिवासी ग्राम परंपराएं इन मूल्यों का जीवंत उदाहरण हैं। अंबेडकर का नजरिया न्याय की मांग करता था और यही न्याय अब हमें आदिवासी ग्राम व्यवस्थाओं से सीख कर और उन्हें सशक्त कर के ही मिलेगा। आज के समय में जब पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत करने की बातें हो रही हैं, तो हमें यह भी देखना होगा कि क्या हम वाकई आदिवासी मॉडल से कुछ सीख रहे हैं या फिर उसी औपनिवेशिक ढांचे को आधुनिक नाम दे रहे हैं?

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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