तेजप्रताप बिगाड़ सकते हैं तेजस्वी का राजनीतिक गणित

Dayanand Roy
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महेश सिन्हा

पटना : राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के परिवार में पड़ी फूट का असर बिहार विधानसभा चुनाव में पड़ सकता है। परिवार और पार्टी से अलग-थलग पड़े लालू के बड़े लाल तेज प्रताप यादव की सियासी गतिविधियां राजद और खास कर  तेजस्वी यादव का चुनावी गणित बिगाड़ सकती है। लालू यादव ने भले ही बिहार की सियासत को अपने करिश्माई नेतृत्व और मुस्लिम-यादव समीकरण से 15 साल तक राज किया।

उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री और छोटे बेटे तेजस्वी यादव को उपमुख्यमंत्री बनाया। लेकिन लालू परिवार में अभी ऐसी महाभारत चल रही है जिसमें तेज प्रताप खुद को कृष्ण बताते हैं।

लेकिन जिस तेजस्वी को वह अपना अर्जुन कहते हैं, वे उनकी एक नहीं सुनते। दरअसल हाल के वर्षों में सार्वजनिक मंचों पर भले ही दोनों भाई साथ दिखे हों, लेकिन उनके बीच एक सियासी अदावत भी बनी रही है।

इस बीच लालू यादव ने तेज प्रताप को परिवार और पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसका कारण भले  ही तेजप्रताप और अनुष्का का प्रेम  प्रसंग रहा हो। लेकिन  लालू यादव भी तेजस्वी की आगे की राह आसान करना चाहते थे।

पार्टी में रहते हुए ‘उपेक्षित तेज प्रताप’ अगर चुनावी मौसम में कुछ और विवाद खड़े करते, उससे बेहतर उन्हें बाहर का रास्ता दिखाना ही रहा। जानकारों का मानना है कि इस वक्त अगर लालू बड़े बेटे को पार्टी से बाहर नहीं निकालते तो उस स्थिति में कई मोर्चों पर चुनौतियां खड़ी हो सकती थी।

गौरतलब है कि तेज प्रताप की पूर्व मुख्यमंत्री दरोगा राय की पोती ऐश्वर्या राय के साथ हुई शादी विवादों में रही है।शादी के बाद पारिवारिक कलह बढ़ता ही  रहा  जो मीडिया की सुर्खियां तक बना।

इसके बाद तेज प्रताप का एक दूसरी लड़की अनुष्का यादव से प्रेम प्रसंग ने इस पूरे  विवाद को नया रंग दे दिया है। विरोधी तो अभी से नेरेटिव सेट करने में लगे हैं कि ‘बिहार की बेटी एश्वर्या’ की जिंदगी क्यों बर्बाद की, अनुष्का पसंद थी तो उससे शादी क्यों की गई? ऐसे में लालू परिवार की प्रतिष्ठा दांव पर लगी थी।

जबकि लालू यादव का तेजस्वी प्रेम हमेशा से ही ज्यादा रहा है। घर के बड़े बेटे जरूर तेज प्रताप रहे हैं, लेकिन सम्मान, ताकत और अब तो मुख्यमंत्री बनाने तक के सपने तेजस्वी के लिए देखे जा रहे हैं।

वैसे  कहा जाता है कि मां राबड़ी देवी ने जरूर कोशिश की थी कि तेज प्रताप कभी भी खुद को उपेक्षित महसूस ना करे। लेकिन लालू का तेजस्वी प्रेम कई मौकों पर जगजाहिर रहा है। 

राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा यही है कि  तेजस्वी की राह में बाधा नहीं बनने को लेकर  ही तेज प्रताप को बाहर कर दिया गया है। उल्लेखनीय है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में जब राजद को करारी हार का सामना करना पड़ा था।

राजद का खाता भी नहीं खुला था।उस वक्त  तेजस्वी  सीन से आउट से हो गए थे और तेज प्रताप ने ‘तेज सेना’ बनाने का ऐलान कर दिया था। बिहार के युवाओं को साधने के लिए वे अलग मंच तैयार कर रहे थे। लेकिन अब चुनाव के ठीक मुहाने पर लालू उम्र के ढलान पर हैं तो उनके दोनों बेटों तेज प्रताप और तेजस्वी के बीच दबे पांव सत्ता की जंग छिड़ चुकी है।

तेजस्वी राजद के भविष्य हैं, जिन्हें लालू ने अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया है। जबकि तेज प्रताप अपनी अलग पहचान बनाने को बेताब हैं। वहीं, तेज प्रताप यादव के ऐलान से अब तस्वीर साफ है कि वह अक्टूबर-नवंबर में संभावित विधानसभा चुनाव में छोटे भाई तेजस्वी के सारथी नहीं, आमने-सामने होंगे। इसके लिए उन्होंने अपनी नई पार्टी बना ली है। नाम रखा है जनशक्ति जनता दल। उन्होने  चुनाव चिन्ह बांसुरी मांगा है।

अब जबकि तेजप्रताप ने अपनी अलग पार्टी बना ली है तो ऐसे में उनका पीछे हटना मुश्किल ही जान पड़ता है। उनके साथ छोटे- छोटे दल भी आ रहे हैं। इस तरह वह एक तरह से तीसरा मोर्चा बनाते हुए दिखाई दे रहे हैं। वैसे तेज प्रताप के पास भले ही  तेजस्वी की तरह अपना कोई मजबूत जनाधार नहीं है और ना ही उनके पास अपना कोई राज्य व्यापी संगठन है।

लेकिन जिस तरह वह अपनी छवि लालू की तरह गढ़ने का प्रयास कर रहे हैं, इससे राजद के कोर वोट बैंक में कुछ सेंधमारी जरूर कर सकते हैं। इसका सीधा नुकसान तेजस्वी को होगा।

2020 विधानसभा चुनाव के नतीजों (एनडीए से सिर्फ 0.23 फीसदी वोट शेयर कम) को देखते हुए यह निर्णायक हो सकता है। 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान तेज प्रताप जहानाबाद और शिवहर सीट से अपने करीबियों को मैदान में उतारना चाहते थे।

टिकट को लेकर खूब जोर-अजमाइश की, लेकिन नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने दोनों जगहों से निर्दलीय अपना प्रत्याशी उतार दिया। हालांकि, शिवहर के प्रत्याशी का नामांकन रद्द हो गया। सिर्फ जहानाबाद से तेज के करीबी चंद्र प्रकाश ही चुनाव लड़े।

उस चुनाव में राजद के सुरेंद्र प्रसाद यादव 1,751 वोटों से चुनाव हार गए थे। जबकि इससे ज्यादा वोट तेज प्रताप के उम्मीदवार को मिला था। चुनाव बाद कहा गया कि अगर तेज प्रताप ने वहां अपना प्रत्याशी नहीं दिया होता तो राजद चुनाव जीत जाती। ऐसे में आसन्न विधानसभा चुनाव में भी तेज प्रताप वोटों में सेंधमारी कर देते हैं तो तेजस्वी का गणित फेल हो सकता है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और न्यूजवाणी के बिहार के संपादक हैं।

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