चिराग एनडीए में सबसे बड़े बारगेनर बन कर उभरे

Dayanand Roy
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सीट शेयरिंग में भाजपा की रणनीति सफल रही,एनडीए को एकजुट रखा

महेश कुमार सिन्हा

पटना : बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर सीटों के बंटवारे में लोजपा (रा) प्रमुख चिराग पासवान सबसे बड़े बारगेनर के रुप में उभरे हैं। वे लोकसभा मे अपनी संख्या के के हिसाब से 30 सीट चाहते थे और 29 हासिल कर ली।

भाजपा भी सीट शेयरिंग की अपनी रणनीति में  कामयाब रही। भाजपा ने न केवल एनडीए को एकजुट रखा,बल्कि भविष्य की राजनीति का भी संकेत दे दिया है। उसने विधानसभा चुनाव में सीटों की साझेदारी के साथ ही 2029 के लोकसभा की तैयारी शुरु कर दी है।

भाजपा समझ चुकी है कि बिहार में नीतीश कुमार को साथ लिए बिना उसका काम  चलने वाला नहीं है। सीट शेयरिंग में भाजपा ने स्पष्ट कर दिया है कि जदयू के साथ  उसकी बराबर की साझेदारी है।दरअसल, भाजपा अब  जदयू के साथ  स्थायी और ठोस  गठबंधन के रुप में काम करना चाहती है।

सहयोगी दलों में चिराग पासवान को तरजीह और उपेंद्र कुशवाहा को पसंदीदा सीटें देकर भाजपा ने पासवान और कुशवाहा वोटों को साधने की कोशिश की है। मालूम हो कि 2020 के विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा एनडीए में नहीं थे। चिराग 135 सीटों पर अकेले लड़े थे। इनमें जीते तो थे सिर्फ एक सीट, लेकिन उनके कारण जदयू के कई उम्मीदवार हार गए थे।

हालांकि ,चिराग  के एकमात्र विजयी उम्मीदवार भी बाद में जदयू में चले गए थे। सच तो यह है चिराग  के रवैए से जदयू में नाराजगी थी। लेकिन भाजपा ने जदयू नेतृत्व  को समझाया कि चिराग को साथ लेकर चलना विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के खिलाफ फायदेमंद साबित होगा। पाला बदलने और नई पार्टी बनाने में पारंगत उपेंद्र कुशवाहा पिछले विधान सभा चुनाव में 104 सीटों पर   लड़े थे,लेकिन एक  भी हासिल  नहीं कर पाए थे।

भाजपा ने कुशवाहा वोटों को आकर्षित करने के लिए उनकी पसंदीदा सासाराम और दिनारा सीट देकर  उपेंद्र को साथ रख लिया है।साथ ही कम सीट देकर  उनकी राजनीतिक हैसियत भी बता दी है।कुशवाहा 10 सीट  मांग रहे थे, मगर उन्हे 6 पर सलटा दिया गया।

वास्तव में कुशवाहा बहुल काराकाट  लोकसभा सीट हारने के बाद  उनकी राजनीतिक साख बुरी तरह प्रभावित हुई थी। एनडीए में दलित राजनीति की अगुवाई करने का सपना देख रहे  जीतन राम मांझी को भी भाजपा ने औकात दिखा दी।

मांझी को अपने परिजनों के लिए पसंदीदा सीटें और कुछ और आश्वासन देकर समझाने में भी भाजपा सफल रही। लेकिन चिराग के मुकाबले पांच गुनी कम सीटें देकर यह संदेश भी दे दिया कि एनडीए में दलित राजनीति के अगुआ चिराग ही हैं। मांझी ने 15 सीटें मांगी थी,लेकिन मिली सिर्फ छह।

लेखक न्यूजवाणी बिहार के संपादक हैं।

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