जदयू की राजनीति और उनका पावर सेंटर!

Dayanand Roy
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विवेकानंद कुशवाहा

संतोष कुशवाहा द्वारा जदयू को छोड़ने का फैसला मेरी नजर में सिर्फ टिकट कटने-मिलने भर का मामला नहीं है।

संजय झा साहब जब 2014 में दरभंगा से लोकसभा चुनाव हारे, तब उनको जदयू की ओर से ससम्मान विधान परिषद की सदस्यता और मंत्री का पद मिला। आज वो पार्टी के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

उसी 2014 के लोकसभा चुनाव में संतोष कुशवाहा ने जीत हासिल कर जदयू का मान बढ़ाया था। वह आज कहां थे? उनकी सांगठनिक जिम्मेदारी क्या थी?

यदि संतोष कुशवाहा के पूर्णिया से लोकसभा चुनाव हारने के बाद उनको संगठन में भी काम करने के लिए कोई बड़ा पद दे देते, जिससे उनकी पार्टी के निर्णयों में हिस्सेदारी होती, तो उन्हें अपना राजनीतिक भविष्य जदयू में अच्छा दिखता।

हालांकि, सवाल तो यह भी है कि वह पूर्णिया से हारे कैसे? अब जब वह पार्टी छोड़ रहे हैं, तो जदयू के लोग उनकी निष्ठा पर बोलेंगे। राजनीति में जो भी लोग हैं, उनकी महत्वाकांक्षा होती है, वह बथुआ छीलने के लिए तो राजनीति में होते नहीं हैं।

देखते-देखते ‘लव-कुश/अति पिछड़े की पार्टी’ जदयू का पावर सेंटर कौन लोग बन गये? यह तो सबको समझ आ ही रहा है। अगर जदयू में भी कोइरी/अति पिछड़े के नेता को उक्त समाज को दिखाने के लिए मुखौटा बन कर रहना पड़े तो अच्छा है कि वह भाजपा-राजद में मुखौटा बन जाये।

यह सिर्फ किसी संतोष कुशवाहा या किसी लक्ष्मेश्वर राय या किसी गोपाल मंडल की बात नहीं है। असल में जदयू बिहार के सबसे कमजोर तबके की पार्टी है, इस दल में लोग हर समाज के हों, लेकिन नेतृत्व/संचालन कमजोर तबके के लोगों के हाथ होना चाहिए।

मैं जदयू को बचे रहने और मजबूती से बिहार की राजनीति में बने रहने का समर्थक हूं। मैंने जदयू की यात्रा को समता पार्टी के कालखंड से देखा है, लेकिन जदयू की अगली पंक्ति के लिए नीतीश जी को जो कुछ मजबूत निर्णय लेने थे, वे नहीं ले पाये अब तक।

अभी भी देर नहीं हुई है। नीतीश जी का नाम और काम बोलता है, लेकिन उनकी धारा को आगे बढ़ाने वाले लोगों की पार्टी में पावर बढ़ाइये। पावरलेस लोगों के हाथ पावर रहता है, तो वे दरबारी खोजने लगते हैं।

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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