
सुशोभित

विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ में रघुवर प्रसाद और सोनसी के सिवा किसी पात्र का कोई नाम नहीं है। सोनसी को भी उपन्यास के आरम्भ में बहुत समय तक केवल ‘पत्नी’ कहा गया था। विनोद जी का बस चलता तो रघुवर प्रसाद को भी केवल ‘व्याख्याता’ पुकारकर ही उपन्यास पूरा कर देते!

यहाँ ‘साधू’ केवल साधू है। उपन्यास के अंत में जब एक ‘साइकिल वाला साधू’ प्रकट होता है तो पहले वाला साधू ‘हाथी वाला साधू’ कहलाने लगता है, किंतु कोई नामोपाधि नहीं धारण करता। ‘विभागाध्यक्ष’ केवल विभागाध्यक्ष हैं। ‘प्राचार्य’ प्राचार्य हैं। एक ‘अम्मा’ हैं, एक ‘बूढ़ी अम्मा’। पिता का नाम ‘पिता’ ही है। यहाँ छोटू है, ददा हैं, दाई हैं, एक लड़के का नाम ‘पेड़ में छुपकर बीड़ी पीने वाला लड़का’ है, एक लड़की का नाम है- ‘ग में छोटी उ की मात्रा गुड़िया’!
पात्रों का नाम रखना कोई कठिन बात तो नहीं किंतु नामकरण से बचकर विनोद जी एक विशेष प्रकार का शैलीकरण अपने इस उपन्यास में करते हैं। यों देखें तो चीज़ों के सच में ही कोई नाम नहीं होते। पहाड़ पहाड़ है, नदी नदी है, चिड़िया चिड़िया है, हाथी हाथी है। ये जातिगत परिचय भी मनुष्यों ने उन पर थोपे हैं, उनके अपने में कोई नाम नहीं। जिस प्राकृत-भावभूमि में पैठकर, भोपाल की निराला सृजनपीठ के निविड़ एकान्त में, अपने समग्र रचनाकर्म के नवनीत की तरह विनोद जी ने यह विलक्षण उपन्यास रचा है, उसमें भी अगर पात्रों के नाम ना हों तो अचरज नहीं।
उपन्यास में ही एक जगह विनोद जी कहते भी हैं :
“अंतहीन जैसे का भी गिनती में अंत हो जाता है। जो गिना नहीं गया, उसका विस्तार अनंत में रहता था कि वह कभी भी कहीं भी है। कितने दिन हो गए को कितने दिन हो गए में ही रहने देना चाहिए।”
इस आदिम नामहीनता के प्रति अपनी संलग्नता का संकेत विनोद जी ने अपनी एक कविता में भी इससे पूर्व किया था :
“चारों तरफ़ प्रकृति
और प्रकृति की ध्वनियाँ हैं
यदि मैंने कुछ कहा तो
अपनी भाषा नहीं कहूँगा
मनुष्य ध्वनि कहूँगा।”
जाने क्या सोचकर उनका नाम ‘विनोद’ रखा गया होगा, क्योंकि भारतीय ही नहीं, बल्कि समूचे विश्व-साहित्य में ‘विनोद’ के तत्त्व का जैसा निर्वाह विनोद कुमार शुक्ल ने किया है, कम ही ने किया। मिलान कुन्देरा कथाकर्म के इस गुण को ‘प्लेफ़ुलनेस’ कहते थे। वे मानते थे कि उपन्यास एक ‘लीलाभूमि’ की तरह है, जिसमें जीवन-विनोद प्रकाशित होता है। भारतीय परम्परा में ‘कला-विनोद’ और ‘साहित्य-विनोद’ जैसे शब्दबंध प्रचलित हैं। गोया कि, साहित्यकर्म कोई गम्भीर कृत्य नहीं, एक केलि है, कौतुक है, कल्लोल है!
भाषा के भीतर नए परिप्रेक्ष्य रचने की ‘विनोद-वृत्ति’ शुक्ल जी में इतनी सघन है कि अचरज नहीं अपने रचनाकर्म के उत्तरार्द्ध में उन्होंने बाल-साहित्य रचा। क्योंकि वे अपनी दृष्टि से जैसे चीज़ों को पहली बार शिशुवत् देख रहे हैं की तरह देखते हैं। ध्यान रहे कि भाषा स्वयं एक परिप्रेक्ष्य है, जो कि आरोपित है। हम चीज़ों को व्यक्त करने के लिए भाषा को आविष्कृत करते हैं। भाषा अपनी संरचना में ही लीलाभूमि है, आश्चर्यवत् है। इसी भाषा के भीतर नए कोणों, वक्रों, दृष्टियों, आशयों, अभिप्रायों और परिप्रेक्ष्यों को विनोद कुमार शुक्ल आजीवन अपने रचनाकर्म में प्रकट करते रहे। एक सीधी-सी बात में भी अपने विशेष परिप्रेक्ष्य से वक्रता रच देने की कला में उन्होंने महारथ हासिल कर ली है।
अनेक जन कहते हैं कि शुक्ल जी अपनी शैली से बंध गए हैं। रीतिबद्ध हो गए हैं। उनके रचनाकर्म के उत्तरांचल में चले आए युक्तियों के दोहरावों से यह बात भले प्रमाणित भी होती हो, किंतु वे उस सृष्टि के इकलौते नरेश हैं और अपने साम्राज्य में अकेले विचरण करते हैं। एक बड़े साम्राज्य में भी घासतृण तो घासतृण जैसी ही होगी। शैली का आकाश एक तरह से ही उस समूचे पर झुका रहेगा।
इस एक उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ में विनोद कुमार शुक्ल ने जो चमत्कार किए हैं, भाषा के जैसे अनूठे तात्पर्यों को प्रकट किया है, मानुष-जीवन की आत्मीयता का जैसा सुरम्य परिसर रचा है (अनेक जन कहते हैं कि ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ में निर्धनता और अभावों के बावजूद सुखमय जीवन का चित्रण किया गया है, यह न केवल एक भ्रान्त दृष्टि है, बल्कि उनके द्वारा रचे गए पात्रों की अस्मिता का हनन भी है। उस उपन्यास में कहीं भी दरिद्रता की गंध तक नहीं है, केवल मनुष्य-जीवन के रंगों, छन्दों, ध्वनियों का एक समारोह ही सर्वत्र है), वह विश्व-साहित्य की निधि है। यह हमारे लिए संतोष और कदाचित् अभिमान की भी बात है कि हमारी भाषा में एक ऐसा स्रष्टा न केवल हुआ, बल्कि आज भी हमारे बीच में उपस्थित है :
“वे गूलर के पेड़ के पास से होते हुए निकले। उन्होंने सिर उठाकर पेड़ को झाँक लिया कि लड़का नहीं है। कोई पक्षी भी नहीं था। पेड़ों, लोगों के बीच केवल वही हैं और कोई नहीं जैसे अस्तित्व से वे सड़क पर चले जा रहे थे। लोग नहीं हैं जैसे लोग उनके पास से आ जा रहे थे। टैम्पो नहीं है जैसे एक-दो ख़ाली टैम्पो गुज़र गए।
घर के सामने बैठे हुए आदमी को दूर से लगा होगा कि दूर दरवाज़ा खोलकर कोई बाहर आया है।
“कौन नहीं है?” उसने ज़ोर से कहा होगा।
रघुवर प्रसाद ने सुना होगा। जवाब में उनके मुँह से निकला- “सोनसी नहीं है!”
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।


