दयानंद राय
सत्ता चाहे भारत की हो या फिर इंग्लैंड या अमेरिका की। वो कभी मजबूत और जनपक्षधर मीडिया तथा पत्रकार नहीं चाहती। यही वजह है कि मीडिया संस्थान कुछ चुनिंदा पत्रकारों को छोड़ दें तो अधिकांश को सिर्फ पेट भरने और घर चलाने लायक पैसे देते हैं।
इसकी वजह ये है कि मजबूत और रीढ़ की हड्डी वाला पत्रकार सत्ता से सवाल पूछने लगता है और इससे उसके अस्तित्व में संकट खड़ा हो सकता है। सत्ता इस सच से वाकिफ है और वो पूंजीपति वर्ग भी जो मीडिया को कंट्रोल करता है।
झारखंड का ही उदाहरण लें, पूर्व की सरकारों की प्राथमिकता में प्रेस क्लब कभी था ही नहीं लेकिन रघुवर सरकार ने प्रेस क्लब बनाना तय किया और रिकार्ड समय में बना भी दिया। इसके लिए पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास बधाई के पात्र हैं।
वहीं, राज्य की हेमंत सरकार न पत्रकारों के लिए स्वास्थ्य बीमा की व्यवस्था कर सकी न उनके आवास की समस्या को हल करने में ही सरकार की कोई मंशा दिखती है।
बिहार की नीतीश सरकार ने चाहा तो वहां बुजुर्ग पत्रकारों के लिए पेंशन की राशि बढा़ दी गयी, भले ही ऐसा चुनावी लाभ के लिए किया गया। लेकिन झारखंड में इस दिशा में कोई सुगबुगाहट नहीं है।
सवाल ये है कि सरकार पत्रकारों के लिए आगे क्यों नहीं बढ़ती। इसका जवाब ये है कि इसके लिए कुछ हद तक पत्रकार भी जिम्मेवार हैं, वे अपनी समस्याओं को लेकर कितना मुखर होते हैं।
वहीं, जिन लोगों को पूर्व में रांची प्रेस क्लब का पदाधिकारी चुना गया, उन्होंने कितनी मजबूती से पत्रकारों के सवालों को सरकार के सामने रखा यह जगजाहिर है, कहना नहीं होगा कि पत्रकार हित के स्थान पर स्वहित को उन्होंने तरजीह दी। अब प्रेस क्लब की नयी कमिटी बनी है तो उससे कुछ बेहतर की उम्मीद की जानी चाहिए।
जो पत्रकार समाज की बेहतरी के लिए बोलता, लड़ता और झगड़ता है उसकी बेहतरी के लिए समाज और सत्ता को क्यों आगे नहीं आना चाहिए। पत्रकारों को आवास क्यों नहीं मिलना चाहिए? जिन पत्रकारों ने अपना पूरा जीवन पत्रकारिता में खपा दिया उन्हें पेंशन क्यों नहीं मिलनी चाहिए।
हेमंत सरकार ने एक काम तो किया है कि जो प्रेस क्लब पत्रकारों को रघुवर सरकार ने दिया था उसकी मरम्मत का काम वो करवा रही है। लेकिन अभी भी कई सवाल हैं जो एड्रेस किए जाने बाकी हैं।
