
सुशोभित

कहते हैं कि जब मोहम्मद तपते रेगिस्तानों में चलते थे तो बादल का एक टुकड़ा उन पर छाँह करने के लिए उनके साथ-साथ चला करता था!

लेकिन दिलचस्प बात ये है कि सबसे पहले इस वाक़ये की तस्दीक़ करने वाला कोई अरब, क़ुरैश या हाशिम नहीं था, यह तस्दीक़ एक ईसाई फ़कीर ने की थी- जिसका नाम इस्लामी परम्पराओं में बाहिरा बताया जाता है, और ईसाई स्रोतों के मुताबिक़ जिनका वास्तविक नाम सेर्गियस था।
ये उस वक़्त का अफ़साना है, जब मोहम्मद की उम्र दसेक साल के क़रीब रही होगी। कुछ स्रोत उस समय उनकी उम्र 9 तो कुछ 12 साल भी बताते हैं। मोहम्मद के चच्चाजान अबू-तालिब की सरपरस्ती में ऊँटों का एक कारवाँ मक्के से उत्तर दिशा की ओर दमिश्क़ चला जा रहा था। वे कारोबार के सिलसिले में वहाँ जा रहे थे और ऊँट माल-असबाब से लदे थे।
काफ़िले में मोहम्मद भी शुमार थे, जिन्हें ऊँटों की देखरेख का काम सौंपा गया था। जब कारवाँ सीरिया (जहाँ पर उस वक़्त रोमनों (बिज़ान्तिन साम्राज्य) की हुकूमत थी) के बुसरा-अल-शाम शहर से गुज़रा तो ईसाई फ़कीर बाहिरा ने अपने मठ से देखा कि झक-सुफ़ेद बादल का एक टुकड़ा भी काफ़िले के साथ-साथ चला आ रहा है। जब काफ़िला एक दरख़्त के नीचे सुस्ताने के लिए रुका तो बादल भी उस दरख़्त पर छा गया। बाहिरा ने परख लिया कि इस काफ़िले में कुछ ख़ास बात है।
कहते हैं कि बाहिरा के पास बाइबिल की एक पुरानी और दुर्लभ प्रति थी और उसमें नुबूव्वत की शिनाख़्त के तरीक़े बताए गए थे। बाहिरा ने काफ़िले को दावत का न्योता दिया। अबू-तालिब ने मोहम्मद को ऊँटों की देखभाल करने को कहा और ख़ुद अपने साथियों के साथ दावत खाने पहुँचे। फ़कीर ने पूछा कि क्या सब लोग आ गए हैं तो उन्हें जवाब मिला, जी, सब तशरीफ़ ले आए हैं।
फ़कीर ने कहा, शायद कोई पीछे रह गया है (क्योंकि बादल अभी तक उसी दरख़्त पर छाया हुआ था)। अबू-तालिब ने कहा, मोहम्मद नाम का लड़का है, उसे ऊँटों और माल-असबाब पर नज़र रखने के लिए पीछे छोड़ आए हैं। लेकिन क्या दावत का न्योता उसके लिए भी था? फ़कीर ने कहा, हाँ, दावत सबके लिए है, उसके लिए भी।
जब मोहम्मद को बाहिरा के मठ में लाया गया तो फ़कीर ने ग़ौर से उन्हें देखा, फिर बारीक़ी से उनका मुआयना किया। उनके जिस्म में कुछ निशानों को पाकर फ़कीर ने ऐलान किया कि यह लड़का आगे चलकर नबी होगा। लेकिन युहूदी (इब्ने-इसहाक़ के बयान के मुताबिक) और रोमन (अल-तबरी के बयान के मुताबिक) इसका क़त्ल करने की कोशिशें कर सकते हैं, इसलिए इसे फ़ौरन हिफ़ाज़त के लिए मक्का भेज दिया जाए। अबू-तालिब ने उनकी बात मानी और तिर्मिज़ी हदीस के मुताबिक अबू बकर (जो आगे चलकर पहले रशीदुन ख़लीफ़ा बने) और बिलाल के साथ मोहम्मद को मक्का भेज दिया।
इस अफ़साने में कई बातें हैं। अव्वल तो यह कि बादल के टुकड़े के मोहम्मद के साथ चलने को एक ऐतिहासिक-तथ्य के बजाय विशिष्टता का आभामण्डल देने वाला काव्यात्मक-प्रतीक समझा जाना चाहिए, जो कि तमाम दैवीय और ईश्वरीय व्यक्तियों के जीवन के साथ जोड़ दिया जाता है। किसी की पैदाइश पर धूमकेतु और विशेष सितारे दिखना, किसी के जन्म से पूर्व उनकी माँ को विशेष स्वप्न आना, किसी के जन्म के बाद उसे देखने के लिए फ़कीरों और साधुओं का आना, किसी के सिर के पीछे दैवीय आभा का वृत्त वग़ैरह-वग़ैरह। लेकिन इस अफ़साने से जो सबसे ज़रूरी बात उभरकर सामने आती है, वो है ईसाईयत और इस्लाम के बीच सदियों से व्याप्त मनोवैज्ञानिक तनाव।
मुसलमानों का मानना है कि बाइबिल में मोहम्मद के अवतरण की पूर्व-सूचना थी, किन्तु बाद के संस्करणों में उसे हटा दिया गया है। ईसाई फ़कीर बाहिरा के पास जो बाइबिल थी, उसमें वह वर्णन सुरक्षित था, जिसके आधार पर उन्होंने मोहम्मद की नुबूव्वत की शिनाख़्त की। दूसरी तरफ़ ईसाई परम्परा बाहिरा को विधर्मी (renegade heretic) समझती है और कहती है कि उन्होंने एक अपसिद्धांत (heresy) यानी क़ुरआन के प्रवर्तन को बढ़ावा दिया था।
कई विद्वानों ने, जिनमें मुसलमान आलिम भी शामिल हैं (मसलन इतिहासकार अह-दहाबी) ने इस अफ़साने के कुछ तथ्यों पर सवाल उठाए हैं, जो इस तरह हैं :
1. अगर बाहिरा ने मोहम्मद को उनकी नुबूव्वत के बारे में इत्तेला दे दी थी, तो जब बाद में हिरा की गुफा में हुज़ूर (सल्ल0) को इलहाम हुआ तो वो हैरान क्यों हुए?
2. अगर मोहम्मद की जान को युहूदियों और रोमनों से ख़तरा था तो अबू-तालिब ने उन्हें कारवाँ से अलग करके मक्का क्यों लौटकर जाने दिया?
3. अगर सीरिया मोहम्मद के लिए मेहफ़ूज़ नहीं था तो 15 बरस बाद 25 की उम्र में मोहम्मद ने ख़दीज़ा के लिए फिर से सीरिया की यात्रा क्यों की थी?
4. बाहिरा के ऐलान और मोहम्मद के इलहाम के बाद भी अबू-तालिब ने इस्लाम को क्यों नहीं क़बूल किया था?
बहरहाल, बुसरा-अल-शाम में बाहिरा का वो मठ आज तलक मौजूद है और रसूलुल्लाह के लड़कपन के उस अहम वाक़ये की याद में हज़ारों सैलानी उसके दीदार के लिए वहाँ मुसलसल उमड़ते रहते हैं।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।


