
संजय किशोर


निधि कुलपति को जानने का सौभाग्य मुझे तक़रीबन तीस साल पहले मिला था। 1998 में जब मैंने ज़ी न्यूज़ से अपनी पत्रकारिता की शुरुआत की, तो पहली बार उनसे सामना हुआ। वह तब भी स्क्रीन पर थीं — वही सौम्य मुस्कान, वही संयमित आवाज़ और वही नपी-तुली प्रस्तुति। कुछ ऐसी उपस्थिति, जो नज़र नहीं बल्कि भीतर तक असर करती है।
2003 में जब वह एनडीटीवी आईं, तो मेरा भी रास्ता उधर ही मुड़ गया। उनके साथ काम करना किसी स्कूल में सीखने जैसा था, जहाँ हर रोज़ शांति से बहुत कुछ सिखाया जाता है — बिना शोर के, बिना अहंकार के।
निधि मूलतः एक न्यूज़ रीडर रही हैं। वह वो दौर था जब एंकर का मतलब केवल तेज़ आवाज़ या भौंचक चेहरा नहीं था, बल्कि एक भरोसेमंद आवाज़ थी जो दर्शकों तक ख़बरों को ईमानदारी से पहुँचाती थी। आज जब न्यूज़ स्टूडियो किसी अखाड़े से कम नहीं लगते, निधि जैसे चेहरे शायद मिसफिट लगते हैं। पर सच तो ये है कि वही ‘मिसफिट’ असल पत्रकारिता की परिभाषा थे, हैं और रहेंगे।
उनकी शैली में एक पुरानी दुनिया की गरिमा थी — कुछ वैसा ही जैसे दूरदर्शन की सलमा सुल्तान या सरला माहेश्वरी की एंकरिंग। चेहरे पर शांति, भाषा में मर्यादा और बातों में भरोसा। आज की पीढ़ी को शायद ये शैली ‘धीमी’ या ‘बोरिंग’ लगे, पर जो लोग 90 के दशक की उस ‘रेट्रो पत्रकारिता’ को जिया है, उनके लिए यह शैली समय की सबसे ज़रूरी कसौटी है।
निधि पूरे करियर के दौरान सिर्फ़ साड़ी पहनती रहीं। आज जब तमाम एंकर पश्चिमी सभ्यता के लिबास में ग्लैमर ढूँढते हैं, निधि की साड़ी एक सांस्कृतिक वक्तव्य की तरह थी — चुपचाप, लेकिन दृढ़। यह केवल परिधान नहीं, एक विचार था। वह हर दिन अपनी पहचान को, अपनी ज़मीन को, अपने मूल्यों को पहनकर स्टूडियो आती थीं। कैमरे के सामने उनका खड़ा होना, मानो यह बताता था कि आधुनिकता और परंपरा एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं।
आज निधि कुलपति एनडीटीवी से रिटायर हो रही हैं। उम्र कहती है 58 साल, पर आंखें मानने को तैयार नहीं। स्क्रीन पर उनकी उपस्थिति अब भी उतनी ही तरोताज़ा लगती है। न चेहरे पर थकान, न आवाज़ में शिकन। शायद यही वजह है कि उनका जाना केवल एक एंकर की विदाई नहीं, बल्कि उस युग की विदाई है जहाँ पत्रकारिता एक ज़िम्मेदारी थी, न कि महज़ एक ‘परफॉर्मेंस’।
उनके जाने के बाद न्यूज़ रूम थोड़े और खाली लगेंगे, और स्क्रीन थोड़ी और शोरगुल से भरी। पर निधि कुलपति की पत्रकारिता एक स्मृति की तरह जीवित रहेगी — वह स्मृति जो हमें याद दिलाएगी कि शब्दों से ज़्यादा ज़रूरी होता है उन्हें कैसे कहा जाए।
उनके जैसा होना मुश्किल है। लेकिन उन्हें याद रखना ज़रूरी है — ताकि जब अगली पीढ़ी पत्रकारिता को केवल टीआरपी का खेल मानने लगे, तो निधि जैसी आवाज़ें एक संदर्भ की तरह मौजूद रहें।


