Home Jharkhand बिना किसी अधिकार और शक्ति के विस्थापन एवं पुनर्वास आयोग विस्थापितों का कैसे भला करेगा : चंपाई सोरेन

बिना किसी अधिकार और शक्ति के विस्थापन एवं पुनर्वास आयोग विस्थापितों का कैसे भला करेगा : चंपाई सोरेन

by Dayanand Roy

रांची : पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता चंपाई सोरेन ने राज्य में विस्थापन एवं पुनर्वास आयोग के गठन पर सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने गुरूवार को कहा कि

विस्थापन एवं पुनर्वास आयोग का गठन कर अपनी पीठ ठोकने का प्रयास कर रही झारखंड सरकार को यह बताना चाहिए कि बिना किसी अधिकार, शक्ति अथवा संसाधन वाला यह आयोग, विस्थापितों का भला किस प्रकार करेगा?

उन्होंने कहा कि जब आयोग के पास विस्थापितों को राहत देने के लिए एक डिसमिल जमीन अथवा एक रुपया भी देने तक का अधिकार नहीं है, तो फिर इस आयोग के गठन से विस्थापितों के जीवन में क्या बदलाव आयेगा?

जब राज्य सरकार के पास विभिन्न परियोजनाओं के विस्थापितों की सूची पहले से है, और उनकी दुर्दशा जगजाहिर है, तो फिर यह आयोग ऐसा क्या नया आंकड़ा खोज निकालेगा? जब एक परामर्शदातृ समिति की तरह बनने जा रहे इस आयोग द्वारा दिए गये सुझावों को मानने के लिए सरकार बाध्य नहीं है, तो फिर इसके होने अथवा ना होने से क्या बदल जायेगा?

सीधी बात यह है कि झारखंड के विस्थापितों की आंखों में धूल झोंकने के लिए राज्य सरकार ने एक और आयोग बना दिया है। विभिन्न परियोजनाओं में अपनी जमीन गंवा चुके उन लोगों को दौड़ने के लिए एक और कार्यालय मिल जायेगा, जहां उनकी स्थिति का आकलन, सामाजिक- आर्थिक सर्वेक्षण, सूचनाओं का संग्रहण एवं विश्लेषण तो होगा, लेकिन उनके सुझाव को मानना अथवा ना मानना, सरकार की मर्जी पर निर्भर करेगा।

उन्होंने कहा कि यह विडंबना है कि जिन विस्थापितों के लिए यह आयोग बनने जा रहा है, उनके हित में किसी भी प्रकार का निर्णय लेने का अधिकार आयोग के पास नहीं होगा। कुल मिला कर, राज्य सरकार ने विस्थापन का दंश झेल रहे इस राज्य के विस्थापित परिवारों की भावनाओं से खिलवाड़ करने, तथा उस पर राजनैतिक रोटियां सेंकने की कोशिश की है।

विस्थापन के मुद्दे पर अगर राज्य सरकार वाकई गंभीर है, तो आपके विभागों में विस्थापित परिवारों की सूची पड़ी हुई है, कई जनप्रतिनिधि भी आपको उनकी समस्याएं बताते रहते हैं, विस्थापित स्वयं भी कार्यालयों में दौड़ते रहते हैं, आज से उन परिवारों की मदद शुरू कीजिए। लेकिन, विस्थापन जैसे गंभीर मुद्दे पर, आयोग के बहाने, तीन साल तक पूरी प्रक्रिया को टालना बिल्कुल गलत है।

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