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मुर्गे की आत्मकथा

by Dayanand Roy

मैं एक मुर्गा हूं। जैसे आदमियों में कुछ लोगों को आत्मकथा लिखने का शौक चर्राता है वैसे ही मुझे भी एक बार लगा कि आदमी तो मेरी आत्मकथा लिखेगा नहीं तो क्यों न मैं ही खुद अपनी आत्मकथा लिख दूं।

हालांकि मैं पढ़ा-लिखा डिग्रीधारी नहीं हूं लेकिन जब से स्वाध्याय से मैंने थोड़ी विद्या हासिल की और कृश्नचंदर का उपन्यास एक गधे की आत्मकथा पढ़ा तभी से मेरा मन मुर्गे की आत्मकथा लिखने को बेचैन है।

तो साथियों जैसा कि मैं प्रारंभ में ही अपना परिचय दे चुका हूं कि मैं एक मुर्गा हूं तो मेरी आत्मकथा भी दुनिया के तमाम मुर्गों की है जो मरने के बाद मुर्ग मुसल्लम या चिकन चिल्ली का रूप धारण कर मनुष्यों के मुंह में पानी लाते रहे हैं।

चूंकि मैं मुर्गा हूं तो मेरी आयु बहुत कम होती है। अपनी कलगी को देखकर मेरे मन में गर्व का भाव जगता है लेकिन जैसे ही मुझे अपनी आयु का ध्यान आता है मैं सहम जाता हूं। कभी-कभी मैं सोचता हूं कि मैंने और मेरे जैसे तमाम मुर्गे- मुर्गियों ने उस कसाई का क्या बिगाड़ा था जो अपने व्यवसाय के लिए हमारी जान ले लेते हैं। गंभीरता से सोचता हूं तो लगता है कि हमारी जान और स्वाद का चोली-दामन का कनेक्शन है।

हमारा मांस मनुष्यों को इतना लुभाता है कि वे गाहे-बगाहे हमारी जान लेते रहते हैं। वो तो हमारी प्रजनन दर इतनी ज्यादा है कि हमारा अस्तित्व बचा हुआ है वरना हम तो कब के धरती से विलुप्त हो गये होते। अब चूंकि मैं मुर्गा हूं सुबह उठकर कुकड़ू-कू करना मैं अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता हूं। और ऐसा सिर्फ मैं नहीं मेरी जाति के तमाम मुर्गे करते हैं। दरअसल ऐसा करके मैं मनुष्यों से पूछता हूं कि तुम्हारे भीतर इंसानियत कब जगेगी और कब तक तुम अपनी जीभ के स्वाद के लिए मेरी हत्या करते रहोगे।

पर तभी ख्याल उठता है मैं एक मुर्गा हूं तो मुझे सवाल पूछने का अधिकार नहीं है। यह अधिकार तो मनुष्यो को है और आत्मकथा भी तो आमतौर पर मनुष्य ही लिखते हैं तो मैं अपनी आत्मकथा लिखकर एक तरह से मनुष्यों के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर रहा हूं। पर मैं जानता हूं कि आत्मकथा प्रभावी तब होती है जब उसे वही लिखे जिसने उन अनुभवों को भोगा है।

मैं आपको बता हूं कि भले ही मैं मुर्गा हूं लेकिन लिखने-पढ़ने में मेरी रूचि उतनी ही है जितनी प्रेमचंद या फिर राहुल सांकृत्यायन की थी। सिर्फ हिन्दी साहित्य ही नहीं मैंने फ्रेंच, उर्दू, अंग्रेजी और कुछ कुछ लैटिन साहित्य का भी अध्ययन किया हूं और पूर्व तथा पश्चिम की साहित्य परंपरा से मैं अवगत हूं। सीधे-सीधे कहूं तो मैं एक विद्वान मुर्गा हूं इसलिए अपने बारे में लिखने का साहस जुटा पाया।

अपनी आत्मकथा लिखने की वजहों को खंगालता हूं तो मालूम पड़ता है कि एक तो यदि मैं अपने बारे में न लिखूं तो दूसरा कोई मुर्गे की आत्मकथा क्यों लिखेगा और यदि किसी ने लिखी भी उसे उसमें मुर्गे का आत्म कहां होगा और यदि उसमें आत्म ही नहीं हुआ तो वो आत्मकथा क्योंकर होगी तो मुर्गे की आत्मकथा लिखने के पीछे की वजह तो यह है कि मैं खुद को अभिव्यक्त करना चाहता हूं और अपनी बातें मानव जाति के साथ शेयर करना चाहता हूं। अपने बारे में कहूं तो मुझे कुक्कुट या एक पक्षी श्रेणी का रज्जुकी प्राणी माना जाता है।

हमारा वर्गीकरण पक्षी वर्ग में किया जाता है। हममें से जो नर होता है उसे मुर्गा और मादा को मुर्गी कहा जाता है। हमारा वैज्ञानिक नाम गैलस गैलस डोमेस्टिकस है। लेकिन हमारा इतना ही परिचय पर्याप्त नहीं है। जब से मानव जाति पृथ्वी पर है तब से हम मनुष्यों की आहार की जरूरतों को पूरा करते आये हैं। मनुष्य जाति को हम इतने प्रिय हैं कि हमारी उपयोगिता को देखते हुए बकायदा उसने एक पॉल्ट्री इंडस्ट्री ही खोल दी है।

तो जैसा कि मैं बता चुका हूं कि मैं मुर्गा हूं और अपने को अभिव्यक्त करने की खातिर ही मैंने अपनी आत्मकथा लिखी है तो आप ये जान लें कि मैं बड़ा स्वाभिमानी हूं। मेरी जाति के कितने ही मुर्गे अब तक लोगों को जगाने के चक्कर में मारे जा चुके हैं लेकिन हमने लोगों को जगाना और उनसे सवाल पूछना नहीं छोड़ा है। मैं चाहता हूं कि हमारा शिकार न किया जाये, मेरी तरह बकरे-बकरियों और भेड़ों को भी खाने के लिए न मारा जाये। हमें जो स्वभाविक आयु मिली है ईश्वर की ओर से। वह हमें मौज से जीते हुए पूरी करनी दी जाये।

तो जैसा कि मैं कह चुका हूं कि मैं जरा साहित्यिक किस्म का मुर्गा हूं और साहित्य की परंपरा मुझे विरासत में मिली है तो मैं यह बता देना चाहता हूं कि अभी मैं यह तय नहीं कर पाया हूं कि मेरी आत्मकथा कितनी लंबी होगी और इसमें कितने अध्याय होंगे। लेकिन इतना तो तय है कि इसमें सच्चाई होगी और इससे कुछ लिखने की मेरी कोशिश का श्रीगणेश हो ही जायेगा।

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