
स्वामी दिव्य ज्ञान

रांची : गुमला जिला में भाजपा के दो ऐसे कार्यकर्ता रहे हैं, जिनका जीवन पूरी तरह संगठन को समर्पित था, लेकिन जिनकी विदाई न तो मंच से हुई और न ही सोशल मीडिया की सुर्खियों में आई।

एक वरिष्ठ बड़ाईक समाज से जुड़े नेता, जो मंडल अध्यक्ष रहे, जिला स्तर पर जिम्मेदारी निभाई और संगठन के कठिन समय में चुपचाप काम करते रहे। दूसरे साहू समाज के ऐसे कार्यकर्ता, जिन्होंने तब भाजपा का साथ दिया जब तेली समाज में पार्टी का नाम लेना भी साहस का काम था। रघुवर दास के प्रभाव से बहुत पहले वे वैचारिक रूप से भाजपा के सिपाही थे।
आज भाजपा के प्रदेश संगठन मंत्री की कार्य पद्धति को देखें तो तस्वीर साफ है। सोशल मीडिया पर वही फोटो बार-बार दिखते हैं, बड़े नेता, बड़े कार्यक्रम, बड़ी बैठकें। कार्यकर्ता का जीवन, उसका त्याग, उसका दुख इन फ्रेमों से बाहर रह जाता है। संगठन क्या केवल वही है जो कैमरे में दिखे?
समीर उरांव के छोटे भाई के दाह संस्कार और दसवें में संगठन मंत्री पहुंचे, प्रवीण सिंह की माता जी के निधन पर भी वे गए। यह ठीक है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वही संवेदना उन गुमनाम, पुराने, जीवनभर खपने वाले कार्यकर्ताओं के लिए भी दिखाई जाएगी या नहीं।
आज यह लिखना एक पहल है। अब देखना यह है कि लिखे जाने के बाद भी क्या संगठन मंत्री ऐसे कार्यकर्ताओं के घर जाएंगे, उनके परिवार के साथ बैठेंगे, बिना किसी बड़े नाम के, बिना किसी औपचारिक मंच के। अगर ऐसा होता है तो संगठन में बदलाव के कुछ लक्षण दिखेंगे, और अगर नहीं, तो यह चुप्पी खुद बहुत कुछ कह देगी।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।


