स्वामी दिव्य ज्ञान
चतरा लोकसभा क्षेत्र आज केवल एक निर्वाचन क्षेत्र नहीं रहा, बल्कि भाजपा की सामाजिक-राजनीतिक रणनीति का प्रयोगशाला बन चुका है। यह वही क्षेत्र है जहां चार आरक्षित विधानसभा होने के बावजूद दशकों तक संगठनात्मक नेतृत्व सवर्ण समाज के हाथों में रहा—चतरा में ब्राह्मण या भूमिहार और लातेहार में राजपूत।
यह कोई संयोग नहीं था, बल्कि चुनावी व्यवहार की गहरी समझ पर आधारित निर्णय था। पिछले बार लातेहार जिला अध्यक्ष राजपूत समाज से था और ठीक है जो दूसरा जिला अध्यक्ष था भोक्ता समाज से था इस बार दोनों जगह से स्वर्ण खत्म।
अब परिदृश्य बदला हुआ है। हालिया सांगठनिक फैसलों से साफ संकेत मिलता है कि चतरा लोकसभा क्षेत्र में जानबूझकर उस संतुलन को तोड़ा गया है। लातेहार जिले में संगठन मंत्री के एक खास व्यक्ति की निर्णायक भूमिका को लेकर पार्टी के भीतर गंभीर चर्चाएं हैं।
यह केवल जिला अध्यक्ष चयन नहीं, बल्कि एक ऐसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके तहत सवर्ण समाज के पारंपरिक प्रभाव को धीरे-धीरे निष्प्रभावी करने की कोशिश हो रही है।
यह सवाल स्वाभाविक है कि जब हजारीबाग लोकसभा क्षेत्र में हजारीबाग और रामगढ़ को इस सोच के साथ संतुलित किया गया कि एक जिले में ओबीसी नेतृत्व रहेगा और दूसरे में जनरल कैटेगरी का प्रतिनिधित्व, तो वही मॉडल चतरा लोकसभा में क्यों लागू नहीं किया गया? क्या यहां जानबूझकर एकतरफा सामाजिक प्रयोग किया गया?
बिहार के चुनावी अनुभव बताते हैं कि सवर्ण समाज संख्या में भले कम हो, लेकिन उसका वोटिंग प्रभाव असाधारण रूप से अधिक होता है। भूमिहार का प्रभाव 1:20, राजपूत का 1:18, ब्राह्मण का 1:8 और कायस्थ का 1:5 के अनुपात में देखा जाता है। यह समाज शोर नहीं करता, आंदोलन नहीं करता, लेकिन जब निर्णय लेता है तो वह सीधे ईवीएम पर दिखता है।
चतरा लोकसभा में जो बदलाव किए जा रहे हैं, उन्हें केवल “सामाजिक संतुलन” कहना वास्तविकता से आंख चुराना होगा। यह एक सुनियोजित राजनीतिक दिशा का संकेत देता है, जहां लक्ष्य केवल संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि भविष्य में सवर्ण समाज को मिलने वाली सीमित लोकसभा सीटों की राजनीतिक प्रासंगिकता को भी समाप्त करना हो सकता है।
सवाल यह नहीं है कि पिछड़े वर्गों को आगे लाना गलत है।
सवाल यह है कि क्या यह बिना संतुलन, बिना संवाद और बिना जमीनी यथार्थ को समझे किया जा रहा है? चतरा लोकसभा आज इसी प्रश्न का केंद्र है। आने वाला चुनाव बताएगा कि यह प्रयोग भाजपा के लिए विस्तार का मार्ग बनेगा या उसकी सबसे अनुशासित वोटिंग जमात के भीतर एक मौन असहमति को जन्म देगा।
