समाज परिवर्तन का सबसे प्रभावी साधन है साहित्यिक सृजन : डॉ जंग बहादुर पांडेय

Dayanand Roy
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हिंदी दिवस पर हिंदी साहित्य भारती की ओर से विचार गोष्ठी का आयोजन

रांची : साहित्यिक सृजन समाज परिवर्तन का सबसे प्रभावी साधन है। हिंदी भाषा में अभिव्यक्ति की अपार क्षमता है। रविवार को ये बातें रांची यूनिवर्सिटी के पीजी हिन्दी डिपार्टमेंट के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ जंग बहादुर पांडेय ने कहीं। वे हिन्दी दिवस के मौके पर हिन्दी साहित्य भारती के तत्वावधान में आयोजित विचार गोष्ठी में बोल रहे थे। उन्होंने युवाओं से हिंदी लेखन और पठन को जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाने का आग्रह किया।

गोष्ठी में अपने अध्यक्षीय संबोधन में अजय राय ने कहा कि “हिंदी दिवस केवल औपचारिकता का दिन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। हमें यह देखना होगा कि तकनीकी और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में हम अपनी मातृभाषा को किस तरह मजबूती दे सकते हैं।”

उन्होंने हिंदी को केवल घर की भाषा न मानकर कार्यक्षेत्र और व्यवसाय की भाषा बनाने की अपील की। गोष्ठी के अन्य वक्ताओं में डॉ. बासुदेव प्रसाद, डॉ. अभिषेक, अरुण अग्रवाल, सुकुमार झा, डॉ. ममता, त्रिपुरेश्वर मिश्रा और डॉ. अंजेश ने भी अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि हिंदी की समृद्धि और प्रसार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी नई पीढ़ी पर है, जिसे डिजिटल और तकनीकी माध्यमों के जरिए भाषा को सशक्त बनाना होगा।

कार्यक्रम के अंत में संकल्प घोषणा की गई कि हिंदी साहित्य भारती आगामी वर्ष में झारखंड के विभिन्न जिलों में “हिंदी जागरूकता अभियान” चलाएगी। इसके तहत गोष्ठियों, कवि सम्मेलनों और कार्यशालाओं का आयोजन होगा।

साथ ही, डिजिटल मंचों पर हिंदी के प्रोत्साहन के लिए विशेष पहल करने का निश्चय लिया गया। कार्यक्रम का संचालन रांची इकाई के अध्यक्ष बलराम पाठक ने किया और धन्यवाद ज्ञापन अरुण अग्रवाल ने दिया।

इस अवसर पर बड़ी संख्या में साहित्यकार, शिक्षाविद्, छात्र-छात्राएं और हिंदी प्रेमी शामिल हुए। कार्यक्रम का सफल आयोजन हिंदी साहित्य भारती रांची इकाई के तत्वावधान में संपन्न हुआ। कार्यक्रम उड़ान एकेडमी के प्रांगण में हुआ।

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