कांग्रेस पर दबाव बनाने की शुरु की कोशिश
महेश सिन्हा
पटना : बिहार विधानसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे को लेकर जारी खींचतान और तेजस्वी यादव को महागठबंधन का सीएम फेस मानने से कांग्रेस के इंकार के बाद राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने एक बार फिर से अपनी सक्रियता बढ़ा दी है।
दरअसल अब उनकी एकमात्र इच्छा अपने बेटे तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाना है। इसके लिए वे तमाम स्वास्थ्य चुनौतियों के बावजूद लगातार विभिन्न इलाकों का दौरा कर रहे हैं।
सूत्रों के हवाले से खबर है कि तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश किए जाने के लिए लालू यादव कांग्रेस पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। लालू की चिंता सिर्फ विरोधियों से नहीं, बल्कि महागठबंधन में सहयोगी कांग्रेस की ‘आनाकानी’ से भी है, जो सीटों के बंटवारे और मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर संशय पैदा कर रही है।
सियासत के जानकारों की मानें तो लालू यादव अब यह मान समझ चुके हैं कि उनके सीधे हस्तक्षेप के बिना न तो सीटों का समझौता संभव है और न ही महागठबंधन में तेजस्वी को सर्वसम्मति से मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया जा सकता है।
उनकी सक्रियता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि उन्हें डर है कि अगर वे निष्क्रिय रहे तो कांग्रेस जैसा बड़ा सहयोगी दल बाद में कन्नी भी काट सकता है, जिससे राजद को भारी नुकसान हो सकता है।
ऐसे में लालू यादव ने अपनी रणनीति को दोतरफा कर दिया है। एक तरफ, वे अपने पारंपरिक कोर वोट बैंक (मुस्लिम-यादव) को साधने के लिए आक्रामक बयानबाजी कर रहे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ, वे क्षेत्रीय अस्मिता और विकास के मुद्दों को उठाकर नए मतदाताओं को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर उनके हमले लगातार तीखे होते जा रहे हैं।
हाल ही में, उन्होंने नीतीश सरकार के 20 साल के शासन को “दो पीढ़ियों को बर्बाद करने वाला” करार दिया था। सोशल मीडिया पर उन्होंने लिखा था कि “ऐ मोदी जी, विक्ट्री चाहिए बिहार से और फैक्ट्री दीजिएगा गुजरात में! यह गुजराती फॉर्मूला बिहार में नहीं चलेगा!” यह बयान बिहार के लोगों की भावना को जगाकर जनाधार का विस्तार करने का एक प्रयास माना जा रहा है।
लालू की सक्रियता का एक और दिलचस्प पहलू धार्मिक और सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश है। राहुल गांधी के सीतामढ़ी में जानकी मंदिर जाने के बाद, लालू सपरिवार गयाजी के विष्णुपद मंदिर पहुंचे। यह कदम ध्रुवीकरण की आशंकाओं को दूर करने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, क्योंकि मुसलमानों के हिमायती राजद के लिए ध्रुवीकरण कभी भी फायदेमंद नहीं रहा है।
सियासत के जानकारों का मानना है कि लालू यादव की नई रणनीति युवा और महिला मतदाताओं को लुभाने, एनडीए के वोट-बैंक में सेंध लगाने और तेजस्वी की छवि को एक प्रगतिशील नेता के रूप में स्थापित करने की है।
‘माई-बहिन मान योजना’ और 100 फीसदी डोमिसाइल नीति के वादे, साथ ही झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (रालोजपा) जैसे नए सहयोगियों को जोड़ना इसी रणनीति का हिस्सा है। हालांकि, परिवार के भीतर मतभेद, महागठबंधन में अंदरूनी कलह और कानूनी चुनौतियां लालू की राह में मुश्किलें खड़ी कर रही हैं। इसके बावजूद, वे लगातार तेजस्वी को ही मुख्यमंत्री का चेहरा बता रहे हैं क्योंकि इस पद के लिए अभी तक कोई दूसरा दमदार चेहरा सामने नहीं आया है।
इसबीच चर्चा है कि सीट बंटवारे का फार्मूला लालू यादव ने तय कर लिया है। लालू यादव ने अपने तय फार्मूले को अपने सहयोगियों के साथ साझा भी किया है, लेकिन कांग्रेस सहित तमाम सहयोगी दल इस सीट शेयरिंग के फार्मूले से नाराज हैं। सूत्रों की मानें तो राजद ने अपने खाते में 136 सीटें रखी हैं। कांग्रेस को 52 सीटें दी गई हैं, जबकि तीनों वाम दलों (भाकपा, माकपा, भाकपा-माले) को मिलाकर 34 सीटें दी गई हैं।
वहीं, वीआईपी पार्टी प्रमुख मुकेश सहनी को 20 सीटें देने का प्रस्ताव है। चर्चा है कि कांग्रेस नेताओं को जैसे ही इस फार्मूले की जानकारी मिली उन्होने तुरंत इसे आलाकमान को बताया। इसके बाद कांग्रेस नेताओं के सुर बदल गए और कहने लगे कि बिहार का मुख्यमंत्री कौन होगा ये जनता तय करेगी। लालू यादव के सीट शेयरिंग फार्मूले से महागठबंधन में भारी नाराजगी है। जबकि तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राजद इसी फार्मूले को लागू करना चाह रह है । लेकिन सहयोगी दल इस फार्मूले को मानने के लिए तैयार नहीं है।
लेखक न्यूजवाणी बिहार के संपादक हैं।
