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नायक से खलनायक तक कैसे पहुंचे लालू प्रसाद!

by Dayanand Roy

विवेकानंद सिंह कुशवाहा

लालू प्रसाद यादव जब तक जनता दल की पहली सरकार के मुखिया रहे, तब तक सही मायने में गरीबों, वंचितों के नेता रहे। राम मंदिर आंदोलन को हवा देने के लिए रथ लेकर निकले भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की 23 अक्टूबर, 1990 की देर रात समस्तीपुर में हुई गिरफ्तारी के बाद लालू प्रसाद मुसलमानों के बीच भी हीरो बन गये थे। उस समय तक लालू प्रसाद को मुख्यमंत्री बने मात्र सात महीने ही हुए थे।

इस बीच जब 1992 में हुए अयोध्या डेमोलिशन के बाद देश भर में दंगे भड़के तो लालू यादव ने साफ कहा कि अगर किसी ने कोई ऐसी जुर्रत की तो सख्ती से निबटा जायेगा। बिहार में इस दौरान कोई दंगा नहीं भड़का। इससे लालू प्रसाद एक झटके में राष्ट्रीय स्तर के नेता बन गये। उनके बयान सुर्खियां बटोरते थे। लालू यादव बिहार से दिल्ली की सियासत में दखल देने लगे। लालू प्रसाद सरकार में मनमाने फैसले लेने लगे थे।

इससे नीतीश कुमार जैसे नेता असहज हुए और पार्टी में प्रतिनिधित्व की जंग शुरू हुई। नतीजा यह हुआ कि 1994 में जनता दल से अलग होकर समता पार्टी बनी। इससे लालू प्रसाद के मन में अन्य पिछड़ी जातियों की दो जाति (कुर्मी और कोइरी) के प्रति नाराजगी के बीज पनप गये। चूंकि, समता पार्टी में दो मजबूत वोट आधार वाले नेता नीतीश कुमार और शकुनी चौधरी थे, जिनकी अगुआई जॉर्ज फर्नांडीज के हाथ थी।

1995 के बिहार विधानसभा चुनाव में समता पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया था। तीसरे चरण का चुनाव खत्म हो गया था। लालू प्रसाद पटना में पत्रकारों के साथ बैठे थे, उन्होंने अनऑफिसियल बातचीत में कुर्मी-कोइरी के लिए एक ‘आपत्तिजनक शब्द’ का इस्तेमाल किया और कहा कि इनके पीछे सवर्ण लामबंद हो रहे हैं, जिसे पॉलिटिकल गॉसिप कॉलम में पत्रकार अनिल सिंह के नाम से हिंदुस्तान टाइम्स ने प्रकाशित कर दिया। पॉलिटिकल गैलरी में इस घटना का बवाल तो हुआ। लालू प्रसाद भी बहुत बमके, लेकिन ज्यादा कुछ किया नहीं, क्योंकि वह जानते थे कि वह बोले तो हैं। उस समय न तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म थे, न ही पिछड़ी आबादी तक अखबार की पहुंच, वह भी अंग्रेजी अखबार। ऐसे में बात जमीन तक पहुंचते-पहुंचते चुनाव समाप्त हो गया।

समता पार्टी को चुनाव में बड़ी असफलता मिली। हालांकि, पहले चुनाव के लिहाज से 7.1% प्रतिशत वोट शेयर के साथ सात विधानसभा सीटें समता पार्टी जीत सकीं। इनमें से तीन कुर्मी (नीतीश कुमार, श्रवण कुमार व अनिल सिंह), दो कोइरी (शकुनी चौधरी व विष्णु कुशवाहा) और एक-एक ब्राह्मण व पासवान (देवेंद्र दुबे और रामस्वरूप पासवान) जाति के नेता विधानसभा पहुंचे थे। इसके अलावा, समता पार्टी के 22 उम्मीदवार दूसरे और 60 उम्मीदवार तीसरे स्थान पर रहे थे।

वहीं, लालू यादव के नेतृत्व में जनता दल को 28 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 167 सीटों पर जीत मिली, जो अकेले बहुमत से ज्यादा थी। साथ ही जनता दल-लेफ्ट अलायंस को 32.5% वोट शेयर के साथ कुल 192 सीटें मिली थीं। हालांकि, उस चुनाव में जगह-जगह बूथ कैपचरिंग की घटनाएं भी हुई थीं, क्योंकि बड़ी संख्या में बाहुबली चुनावी मैदान में थे। लालू प्रसाद इस रिजल्ट से सातवें आसमान तक पहुंच चुके थे। कुछ समय बाद लालू प्रसाद जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने, क्योंकि तत्कालीन अध्यक्ष एसआर बोम्मइ का नाम हवाला कांड में आ गया था।

इधर बिहार में वंचित आबादी को उम्मीद थी कि जातीय वर्चस्व की राजनीति अब खत्म हो जायेगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। सामंतों की जगह एक नये तरह की जातीय वर्चस्व (नव सामंत) की राजनीति शुरू हो चुकी थी। समता पार्टी से जुड़े आम लोग इसके शिकार बन रहे थे। बहुतेरे बाहुबली, जो चुनाव जीत कर सदन पहुंचे थे। वह सरकारी दरबार लगाने लगे थे।

नीतीश कुमार अयोध्या डेमोलिशन को लेकर भाजपा के कटु आलोचक थे, लेकिन बिहार की स्थिति को भांपते हुए 1996 में ही समता पार्टी और भाजपा ने गठबंधन का फैसला किया। इसी बीच बिहार सरकार के अफसर अमित खरे को वर्ष 1996 में चारा घोटाला पकड़ में आया। उधर दिल्ली में अस्थिर सरकारों का दौर था, 16 मई, 1996 को अटल बिहारी वाजपेयी देश के पीएम बने। 13 दिन ही सरकार चली। इस दौरान ही चारा घोटाला के मामले में लालू प्रसाद की संलिप्तता की जांच के लिए केस सीबीआई को सौंपे जाने की बात हुई।

इसके बाद कांग्रेस के बाहरी सहयोग से 1 जून, 1996 को संयुक्त मोर्चा की सरकार बनी। एचडी देवगौड़ा देश के नये प्रधानमंत्री बने। देवगौड़ा साहब ने भी चारा घोटाले की जांच को सीबीआई को सौंप कर केस आगे बढ़ाने का निर्णय लिया। दिलचस्प है कि उस समय लालू प्रसाद उन्हीं की पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। लालू प्रसाद बेहद नाराज थे। कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष सीताराम केसरी लालू प्रसाद के घनिष्ठ मित्र थे। उनके इशारे पर कांग्रेस ने देवगौड़ा सरकार से समर्थन वापस ले लिया। फिर आइके गुजराल पीएम बने, पर सीबीआई प्रमुख ने कहा कि उनके पास लालू प्रसाद के खिलाफ चारा घोटाले के पर्याप्त सुबूत हैं। लालू प्रसाद ने तमाम कोशिशें की, पर उनकी कोशिशें नकाफी साबित हुईं।

आखिरकार जून, 1997 को सीबीआई ने लालू प्रसाद पर चार्जशीट दाखिल किया। लालू प्रसाद को समझ आ गया कि अब उनको सीएम पद से इस्तीफा देना ही पड़ेगा। 5 जुलाई, 1997 को लालू प्रसाद ने जनता दल को तोड़ कर ‘राष्ट्रीय जनता दल’ बना दिया। 22 में से अधिकांश सांसद लालू प्रसाद के साथ आ गये। लालू प्रसाद अपनी सत्ता को किसी भी सूरत में गंवाना नहीं चाहते थे, इसलिए उन्होंने सबको चौंकाते हुए 24 जुलाई को अपनी पत्नी राबड़ी देवी को बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया। वह विशुद्ध घरेलू महिला थीं। उनको तब तक कोई राजनीतिक अनुभव नहीं था। वह शैक्षणिक रूप से भी मात्र पांचवीं कक्षा तक पढ़ी थीं। इसके बावजूद लालू प्रसाद ने जनता दल से राजद में आये अपने सहयोगी नेता की जगह उनको बिहार का मुखिया बना दिया। किसी ने विरोध का ज्यादा साहस भी नहीं दिखाया। इसके बाद लालू प्रसाद चारा घोटाला मामले में जेल गये। बाद में लालू प्रसाद न्यायालय द्वारा दोषी भी सिद्ध किये गये।

लेकिन जिस दिन उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल बनाया, उसी दिन से उन्होंने खुद को एम-वाई और अपने परिवार में समेट लिया। चूंकि जनता दल से लालू प्रसाद का दिल जल गया था। एमवाई समीकरण जाति से ऊपर का समीकरण था, जो राजद का मजबूत पिलर बना, बाकी जिस जाति का उम्मीदवार दो, उसका थोड़ा वोट तोड़ लेने की नीति अपनायी गयी। यही नीति कमोबेश अब भी राजद की रहती है।

राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाकर लालू प्रसाद से वह भूल हुई, जिसने बिहार को अपराध की गहरी खाई में धकेल दिया। राबड़ी जी के भाई साधु यादव और सुभाष यादव राजद सरकार रूपी गाड़ी के कंट्रैक्टर और खलासी बन गये। भले लालू प्रसाद को लगा कि जेल से वह सत्ता संभाल रहे हैं, पर सत्ता डोल रही थी। जगह-जगह लालू प्रसाद की एक प्रतिकृति दिखने लगी। जिसे अपराध करते समय कोई भय नहीं लगता था। कोई विरोध करे तो उसको दो थप्पड़ मारने के बाद पूछा जाता था कि क्या हुआ? सारे सरकारी प्रतिष्ठान किसी तरह काम कर रहे थे बस। बाद में चलकर यही वजह बनी राजद के सत्ता से बाहर जाने की, आज भी जो उनकी सबसे बड़ी मजबूती है, वही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है। 2010 के विधानसभा चुनाव में तो उनके पिलर का हिस्सा भी दरका और राजद अपने न्यूनतम सीटों पर पहुंच गया।

लालू प्रसाद ने अपने समाज में क्रांति तो पैदा की, लेकिन अल्हड़पन को भी बढ़ावा दिया। 15 साल सत्ता में रहने और 15 साल विपक्ष में रहने के बावजूद उनके दल के पास इंडीजीनस लोग सलाहकार नहीं हैं। लालू प्रसाद के साथ बाबा रहते थे, तेजस्वी प्रसाद के साथ मनोज झा रहे। बाद में संजय यादव आये भी तो हरियाणा से। अब नयी पीढ़ी में कुछ ओजस्वी युवा राजद के पास हैं, लेकिन उनके मानस ने नीतीश कुमार से चतुराई भरी राजनीति सीखी है। इवन आज तेजस्वी यादव भी नीतीश कुमार स्टाइल की राजनीति करते नजर आते हैं। क्योंकि उनको भी पता है कि उनके पिताजी की वजह से उनको पार्टी और उनकी ताक़त मिली है, सत्ता नहीं मिल सकती। यही कारण था कि 2020 के चुनाव में बैनर तक से लालू प्रसाद हटा दिये गये थे।

खैर, बिहार में अगले कुछ महीने बाद चुनाव है। आगामी चुनाव या तो 1995 के जैसा परिणाम देगा या फिर 2010 के जैसा। यही दो गुंजाइश मुझे नजर आ रही है। प्रशांत किशोर की जनसुराज भले एक भी सीट न जीत पाये, लेकिन सांसें सबकी अटका कर रखेंगे।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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