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बिहार चुनाव के दूसरे चरण में सीमांचल की 24 सीटों पर है दोनों गठबंधनों की नजर

by Dayanand Roy

सीमांचल में इस बार ओवैसी फैक्टर कितना असर करता है,यह देखना दिलचस्प होगा

महेश कुमार सिन्हा

पटना : बिहार में विधानसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान संपन्न होने के बाद  राजनीतिक दल अब अपनी ताकत  दूसरे चरण के लिए झोंक रहे हैं। दूसरे चरण में  राज्य के 20 जिलों   की 122 सीटों पर 11 नवंबर को मतदान होना है। इनमें सीमांचल की  24  सीटें भी शामिल हैं। इसको लेकर सभी सियासी दलों ने अपनी पूरी ताकत इस इलाके में झोंक दी है। इन सीटों के लिए चुनाव प्रचार रविवार शाम छह बजे समाप्त  हो जायेगा।

बिहार के चार जिलों किशनगंज, अररिया, कटिहार और पूर्णिया को सीमांचल कहा जाता है।इस क्षेत्र की 24 सीटों में से  पिछले चुनाव में 12 सीटों पर  एनडीए ने जीत हासिल की थी। महागठबंधन को आठ सीटें मिली थी।पांच सीट असदुद्दीन ओवैशी की पार्टी एआईएमआईएम के खाते में गई थी। किशनगंज की चार सीटों में एक पर भी एनडीए का खाता नहीं खुला था।

2020 के चुनाव में भाजपा को आठ,जदयू को चार,कांग्रेस  को  पांच, राजद और भाकपा-माले को एक-एक सीट मिली थी। उस चुनाव में एआईएमआईएम ने पांच सीट जीत कर  बिहार में अपनी मजबूत स्थिति दर्ज कराई थी।

हालांकि, उसके चार विधायक बाद में राजद में शामिल हो गए थे। इस बार इन क्षेत्रों में दोनों गठबंधनों के बड़े नेताओं ने पूरा जोर लगाया है। महागठबंधन अपनी वर्तमान स्थिति कायम रखने की कोशिश कर रहा है। जबकि एनडीए महागठबंधन की सीटों में सेंधमारी करने के फिराक में लगा हुआ है।

बिहार अल्पसंख्यक आयोग के मुताबिक, सीमांचल के किशनगंज में 67 प्रतिशत, कटिहार में 42 प्रतिशत, अररिया में 41 प्रतिशत और पूर्णिया में 37 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। इस इलाके में एआईएमआईएम के दस्तक से अब एनडीए और महागठबंधन के लिए राहें उतनी आसान नहीं  रही । आंकड़े इस बात की गवाह है कि सीमांचल क्षेत्र में हर बार मतदाताओं का मिजाज बदलता है और परिणाम चौंकाने वाले होते हैं। इस बार एआईएमआईएम, जनसुराज और कुछ बागी नेता भी  दोनों गठबंधनों की राह  में रोड़े अटकाने को आतुर हैं।

एआईएमआईएम पिछले चुनाव में 20 सीटों पर  लड़ी थी। जिसमें 5 सीटों पर जीत हासिल की थी, लेकिन 14 सीट पर उसके उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। एआईएमआईएम को राज्य में पड़े कुल मतदान का 1.24 फ़ीसदी वोट मिला था, लेकिन जिन सीटों पर पार्टी ने उम्मीदवार उतारे थे, उनमें पार्टी का वोट प्रतिशत 14.28 फीसदी था। राजद और कांग्रेस के कोर वोट बैंक में मुस्लिम मतदाता शामिल हैं। ओवैसी की नजर भी मुस्लिमों पर ही टिकी है। राजद की पूरी कोशिश मुस्लिम वोटों को एकमुश्त अपने साथ बांधकर रखने की है, जिसके लिए तेजस्वी यादव वक्फ कानून का विरोध करने को लेकर पसमांदा मुस्लिमों तक को साधने में जुटे हैं। 

  राहुल गांधी भी सीएए-एनआरसी के मुद्दे पर ‘वोट अधिकार यात्रा’ निकालकर मुस्लिमों को अपने पक्ष में लामबंद करने की कोशिश की है। राहुल गांधी की वोट अधिकार यात्रा के बाद सीमांचल का माहौल महागठबंधन के पक्ष में बना है। महागठबंधन बनाम एनडीए की सीधी जंग में मुसलमानों का झुकाव महागठबंधन की तरफ दिख रहा है। ऐसे में ओवैसी की पार्टी को अपनी सियासी उम्मीदें धूमिल होती दिख रही है। इससे एआईएमआईएम में बेचैनी है।

उधर सीमांचल की अहमियत को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  खुद इस इलाके पर फोकस किए हुए हैं।  पीएम मोदी ने बीते दिन फारबिसगंज में चुनावी सभा को संबोधित कर मतदाताओं को गोलबंद करने का प्रयास किया है। मोदी का  रुख़ केवल विकास परियोजनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके जरिए वह सीमांचल में एनडीए की छवि को मजबूत करने की रणनीति भी अपना रहे हैं।

चुनाव  विशेषज्ञों का मानना है कि पीएम मोदी का हर भाषण केवल वादों का एलान नहीं होता, बल्कि उसमें उनकी पूरी चुनावी रणनीति छिपी होती है। दरअसल, सीमांचल का इलाका न केवल अपनी भौगोलिक स्थिति बल्कि सामाजिक और धार्मिक समीकरणों की वजह से भी राजनीतिक रूप से अहम है। यह क्षेत्र नेपाल, बांग्लादेश के साथ ही पश्चिम बंगाल से सटा हुआ है, जहां मुस्लिम आबादी और पिछड़े वर्गों की बड़ी हिस्सेदारी है।

इस बार असदुद्दीन ओवैसी ने अपने 25 उम्मीदवारों में 23 मुस्लिम तो दो हिंदू उम्मीदवार भी दिए हैं। बिहार में ओवैसी ने जिस तरह मुस्लिमों के साथ-साथ हिंदू प्रत्याशी दिए हैं, वह उनका बदला हुआ सियासी रुख दर्शा रहा है। पूर्व सांसद सीताराम सिंह के बेटे राणा रंजीत सिंह को ढाका सीट से टिकट दिया है, तो मनोज कुमार दास को सिकंदरा सीट से उम्मीदवार बनाया है। राणा रंजीत सिंह राजपूत समुदाय से हैं तो मनोज कुमार दलित समुदाय से हैं। जहां तक सियासी जमीन की बात है,ओवैशी की पकड़ मुस्लिम बहुल इलाके तक ही सीमित है। पिछले कुछ दिनों से  ओवैसी ने जिस तरह ताबड़तोड़ सीमांचल में दर्जनों स्थानों पर सभा कर वोटरों की गोलबंदी करने की कोशिश की है उससे उनकी मंशा साफ साफ हो गई है। वह महागठबंधन, खासकर तेजस्वी यादव पर ज्यादा हमलावर हैं। क्योकि  मुस्लिम और यादव ही राजद का आधार वोट रहा है।  हालांकि, बदले हुए सियासी माहौल में ओवैसी  2020 जैसा करिश्मा दोहरा सकेंगे, इसमें संदेह है।

एआईएमआईएम ने अपने  मौजूदा विधायक अख्तरुल ईमान को अमौर से टिकट देने के साथ पूर्व सांसद मुनाजिर हसन को मुंगेर से प्रत्याशी बनाया है। इसके अलावा चार बार के पूर्व विधायक तौसीफ आलम को बहादुरगंज सीट से उम्मीदवार बनाया है। पर हकीकत यह है कि विधानसभा का यह चुनाव एनडीए और महागठबंधन के बीच ही सिमटता जा रहा है। इसके चलते  असदुद्दीन ओवैसी की राजनीति  मुश्किल भरी  दिख रही है। ओवैसी की पार्टी 2020 की तरह चुनावी मैदान में भी नहीं दिख रही है। यही नहीं, प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान और उनके करीबियों को लेकर भी लोगों में नाराजगी साफ झलक रही है, टिकट बेचने से लेकर पार्टी को तानाशाही की तरह चलाने के आरोप उन पर लग रहे हैं। 2015 से अख्तरुल ईमान बिहार में एआईएमआईएम की कमान संभाल रहे हैं, जिसे लेकर भी लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। अख्तारुल ईमान के रवैए के चलते ही एआईएमआईएम के 4 विधायकों ने पार्टी छोड़ी थी । इस बार भी टिकट वितरण पर सवाल खड़े हुए हैं। इसका असर अख्तरुल ईमान की सीट ही नहीं, बल्कि सीमांचल के पूरे इलाके में भी दिख रहा है। ऐसे में सीमांचल में इस बार की लड़ाई और भी दिलचस्प होगी। 2020 में एआईएमआईएम के प्रदर्शन ने भाजपा को फायदा पहुंचाया था। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने यहां की पांच सीटें जीतकर विपक्षी वोट बैंक में सेंध लगा दी थी। इस वजह से भाजपा सीमांचल में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। इस बीच महागठबंधन ने सीमांचल पर अपना ध्यान केंद्रित कर मुस्लिम वोटों को अपने पक्ष में करने का भरपूर प्रयास किया है।

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