नितिन नवीन अब जायेंगे राज्यसभा, बिहार से राज्यसभा की पांच सीटें अगले साल खाली हो रही हैं

Dayanand Roy
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पटना : भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नवीन का राज्यसभा में जाना लगभग तय माना जा रहा है। राज्यसभा के लिए चुने जाने के बाद  वह विधानसभा की सदस्यता से भी इस्तीफा दे देंगे। मंत्री पद से वह पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं। नई जिम्मेदारी को लेकर उनका दिल्ली में रहना जरूरी है।

बिहार से  अगले साल राज्यसभा की खाली होने वाली पांच सीटों को लेकर सियासी गलियारों में हलचल बढ़ गई है। सियासी गलियारे में कई उम्मीदवार चक्कर लगाने लगे हैं। दरअसल, बिहार से राज्यसभा  के पांच सदस्यों का कार्यकाल अगले साल पूरा हो रहा है।

इनमें राजद के प्रेमचंद गुप्ता और एडी सिंह, जदयू के हरिवंश नारायण और रामनाथ ठाकुर, तथा राष्ट्रीय लोक मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा शामिल हैं। हालांकि, राज्यसभा का गणित काफी सटीक है। बिहार विधानसभा में 202 विधायक एनडीए के हैं और शेष 41 अन्य दलों के पास हैं।

राज्यसभा में एक सदस्य के चुनाव के लिए 48 विधायकों की जरूरत होती है। ऐसे में चार सीटों पर कुल 192 विधायकों की संख्या तय कर देती है कि एनडीए अपने उम्मीदवार को भेजने में पूरी तरह सक्षम है। लेकिन पांचवीं सीट के लिए अन्य दलों के सहयोग की दरकार रहेगी, वरना यह सियासी पेंच जटिल बन सकता है।

जमीनी रणनीति के अनुसार, जदयू अपने दोनों वरिष्ठ नेताओं हरिवंश नारायण और रामनाथ ठाकुर को ही रिपीट करने का मन बना चुकी है। हरिवंश राज्यसभा के सभापति हैं और रामनाथ ठाकुर केन्द्रीय मंत्रिमंडल में हैं, इसलिए उनका फिर से चयन राजनीतिक रूप से सुरक्षित विकल्प है।

भाजपा की ओर से दो सीटों पर उम्मीदवार तय माने जा रहे हैं, जिसमें कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नवीन का नाम पहले से ही तय है। नितिन नवीन ने हाल ही में मंत्री  पद से इस्तीफा दे दिया है। आर्थिक नुकसान नहीं हो,इसी वजह से उन्होने अभी विधानसभा की सदस्यता नहीं छोड़ी है।

राज्यसभा की चौथी और पांचवीं सीट को लेकर अभी पेंच  हैं। विधानसभा चुनाव के दौरान हुए समझौते के अनुसार, लोजपा( रा) को एक सीट मिलेगी, जो चिराग पासवान की मां रीना पासवान को दी जा सकती है। वहीं, राष्ट्रीय लोक मोर्चा के उपेंद्र कुशवाहा को दूसरी सीट पर दोबारा भेजा जा सकता है। लेकिन चौथी और पांचवीं सीट के लिए जिसे भी उम्मीदवारी चाहिए, उसे वोटों का जुगाड़ करना पड़ेगा।

सियासी जानकारों का मानना है कि नए वर्ष में बिहार की ये पांच राज्यसभा की सीटें केवल नामों का खेल नहीं, इसमें सत्ता समीकरण, गठबंधन राजनीति और विधायकों की ताकत की भी असली परीक्षा होगी। एक ओर जहां एनडीए को अपनी संख्या बल का लाभ है, वहीं महागठबंधन को रणनीतिक चालें चलकर ही सीटें हासिल करनी होंगी।

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