कांग्रेस और राजद में फिर शुरु हुआ खटपट, महागठबंधन से अलग होगी कांग्रेस!

Dayanand Roy
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महेश कुमार सिन्हा

पटना : बिहार चुनाव में करारी हार के बाद महागठबंधन के दो प्रमुख घटक कांग्रेस और राजद के बीच दूरियां बढ़ती जा रही है। दोनों दलों में मतभेद अब खुलकर सामने आ रहे हैं। दिल्ली में कांग्रेस के प्रत्याशियों के साथ हुई पार्टी आलाकमान की बैठक में कांग्रेस प्रत्याशियों ने आरोप लगाया है कि राजद  के साथ गठबंधन के कारण  चुनाव में  पार्टी की यह दुर्गति हुई है।

अगर पार्टी अकेले चुनाव लड़ती तो इससे बेहतर रिजल्ट आता। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर  शनिवार को  पार्टी के निर्वाचित उम्मीदवारों के साथ  केंद्रीय नेतृत्व की बैठक हुई। सूत्रों के अनुसार कांग्रेस राजद से नाता तोड़ने का मन बना चुकी है। इसकी औपचारिक घोषणा नये साल  में की जा सकती है।

उधर,  राजद का कहना है कि  इस चुनाव में कांग्रेस को जीतनी भी सीटें मिली हैं वह राजद की देन है। अगर राजद साथ नहीं होती तो उनका खाता भी नहीं खुलता।

राजद के प्रदेश अध्यक्ष मंगनी लाल मंडल ने शनिवार को कहा कि कांग्रेस चुनाव में मिली हार की  समीक्षा कर रही है। राजद भी हार की समीक्षा कर रही है और भी गठबंधन की पार्टियां समीक्षा कर रही है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस का यह विश्लेषण है, उनकी अलग होने की मर्जी है तो होंगे, गठबंधन में किसी को रोक कर नहीं रखा जा सकता है।

मंगनी लाल मंडल ने कहा कि बिहार में जनाधार राजद का है। जनाधार के बदौलत गठबंधन में कई लोग हैं, किन को रहना है, नहीं रहना है वह तय करेंगे। मंडल ने जोर देकर कहा कि बिहार में राजद का मजबूत जनाधार है, जो सहयोगी दलों को फायदा पहुंचाता है। उन्होंने 2020 के चुनाव का जिक्र करते हुए तंज कसा और कहा कि 2020 में कांग्रेस ने 72 सीटें मांगी थीं, लेकिन 19 पर जीत हुई वह भी राजद की बदौलत।

मंगनी लाल मंडल के इस बयान ने बिहार की विपक्षी राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। उन्होंने यह इशारा कर दिया कि अगर कांग्रेस महागठबंधन से किनारा करती है, तो राजद को  कोई  आपत्ति नहीं होगी, क्योंकि पार्टी खुद को बिहार में अपने  जनाधार के दम पर  मजबूत मानती है।

कांग्रेस ने मंगनी लाल मंडल के इस बयान पर पलटवार किया है। प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता असितनाथ तिवारी ने कहा कि अगर कांग्रेस की कोई ताकत नहीं है तो राजद गठबंधन में साथ क्यों है? तिवारी ने राजद के दावों को खारिज करते हुए कहा कि हार की जिम्मेदारी सबकी है, न कि सिर्फ एक दल की। वहीं, कांग्रेस के एक अन्य प्रवक्ता ज्ञान रंजन ने मंडल को निशाने पर लेते हुए कहा कि मंडल जी को कुछ कहना है तो महागठबंधन की ऑर्डिनेशन कमेटी के अध्यक्ष तेजस्वी यादव से कहें।

मीडिया में बयान देने का क्या मतलब है? इस बीच, सत्ताधारी भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सैयद शाहनवाज हुसैन ने तंज कसते हुए कहा कि दोनों दल चुनाव से पहले भी आपस में लड़ रहे थे, चुनाव बाद भी लड़ रहे हैं। भाजपा इसे विपक्ष की कमजोरी के रूप में देख रही है। जबकि  बिहार की सियासत में अब यह सवाल उठने है कि  यह आपस में  नोकझोंक है या गठबंधन टूटने का संकेत?

उल्लेखनीय है कि बिहार विधानसभा चुनाव में 61 सीटों पर लड़ कर महज 6 सीटें जीतने के बाद कांग्रेस आलाकमान ने अपने सभी प्रत्याशियों को समीक्षा बैठक के लिए दिल्ली बुलाया था। जहां कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और नेता राहुल गांधी ने 10-10 नेताओं के ग्रुप से मुलाकात की और उनसे फीडबैक लिया। इस दौरान सभी नेताओं ने एक स्वर में कहा कि अगर पार्टी चुनाव में अकेले उतरती तो नतीजे कुछ और होते क्योंकि राजद के साथ गठबंधन होने के कारण लोगों ने उन्हें वोट नहीं किया क्योंकि लोगों को लगता था कि अगर राजद सत्ता में वापस आती है तो बिहार में फिर से जंगलराज की वापसी हो सकती है।

वहीं, दूसरी तरफ पटना के राजद कार्यालय में भी समीक्षा बैठकों का दौर जारी है। राजद के कई वरिष्ठ नेता प्रदेश अध्यक्ष मंगनी लाल मंडल की मौजूदगी में राजद प्रत्याशियों के साथ बैठक करके हार की वजहों को तलाश रहे हैं कि आखिर किस वजह से पार्टी को चुनाव में इतनी बुरी हार का सामना करना पड़ा है? सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, कांग्रेस और राजद दोनों ही अपनी हार के लिए एक दूसरे को जिम्मेदार मान रहे हैं। राजद का तबका मानता है कि कांग्रेस के ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने और उनके मतदाताओं का वोट शिफ्ट न होने के कारण राजद को इतनी बुरी हार मिली है। वहीं, कांग्रेस का खेमा मानता है कि राजद के 1990 से लेकर 2005 तक के शासनकाल के दौरान जिस तरह से अराजकता बिहार में था उस वजह से लोग उनके गठबंधन को वोट नहीं करते हैं।

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