
रांची : झामुमो के प्रवक्ता तथा केंद्रीय सदस्य डॉ तनुज खत्री ने कहा है कि मोदी सरकार के 11 साल पूरे होने पर झारखंड में अपनी तथाकथित उपलब्धियाँ गिनवाने के लिए भाजपा ने स्मृति ईरानी को भेजा है, लेकिन यहाँ जश्न नहीं, सवाल पूछे जा रहे हैं।

झारखंड की धरती पर भाजपा के दावों से ज़्यादा गूँज रही है आम लोगों की पीड़ा और निराशा। जब पेट खाली हो, युवा बेरोज़गार हों, किसान हताश हों — तब जश्न नहीं, जवाबदेही ज़रूरी होती है।

पहला, झारखंड विधानसभा ने सर्वसम्मति से आदिवासी-सरना धर्म कोड की माँग की थी। मगर केंद्र सरकार ने इस पर आज तक कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया। झामुमो प्रवक्ता ने कहा कि यह सिर्फ एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता और पहचान के साथ किया गया सुनियोजित अन्याय है। यह वही सत्ता है जो चुनाव के समय जंगल की तस्वीरें खिंचवाती है, मगर आदिवासी धर्म को संवैधानिक मान्यता देने में हमेशा हिचकती रही है।
दूसरा, मणिपुर में महीनों तक हिंसा चलती रही, महिलाओं के साथ बर्बरता हुई, इंसानियत की चीखें कैमरों में क़ैद हो गईं — मगर दिल्ली से न संवेदना आई, न जवाबदेही। डॉ. तनुज ने कहा कि जब एक संवैधानिक राज्य में महीनों तक आग लगी रहे और प्रधानमंत्री चुप रहें, तो यह सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं, नैतिक दिवालियापन है।
तीसरा, छत्तीसगढ़ में हसदेव के जंगलों को काटने की इजाज़त देना इस सरकार की पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों के प्रति असली सोच को उजागर करता है। JMM प्रवक्ता ने कहा कि एक ओर सरकार जलवायु परिवर्तन की बातें करती है, दूसरी ओर देश के फेफड़ों को नष्ट करने पर आमादा है। आदिवासी इलाकों में जमीन और जंगल सिर्फ संसाधन नहीं, जीवन हैं — यह सरकार शायद कभी नहीं समझेगी।
चौथा, जब देश के युवा वर्षों की मेहनत करके परीक्षाएँ देते हैं, और फिर NEET, NET, SSC जैसी परीक्षाओं में पेपर लीक होता है — तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, उनकी उम्मीदों की हत्या है। भाजपा ने युवाओं से रोजगार के वादे किए, लेकिन उन्हें सिर्फ परीक्षा की तारीखों और घोटालों के बीच भटकने पर मजबूर कर दिया।
पाँचवाँ, नोटबंदी को सरकार ने ऐतिहासिक फैसला बताया था, लेकिन इसका नतीजा छोटे दुकानदारों, मज़दूरों और आम जनता को भुगतना पड़ा। 100 से ज़्यादा लोगों की मौतें हुईं, नौकरियाँ गईं, और अंत में वही पुरानी करेंसी वापस आ गई। जनता से माफ़ी माँगने के बजाय सरकार आज भी इसे उपलब्धि बताती है।
छठा, तीन कृषि कानून बिना किसी संवाद के थोपे गए, जिससे देशभर के किसान सड़कों पर उतर आए। 700 से ज़्यादा किसानों की जान चली गई — और अंत में सरकार को माफ़ी माँगकर कानून वापस लेने पड़े। डॉ. तनुज ने कहा कि यह भरोसे का सबसे बड़ा विश्वासघात था।
सातवाँ, कोविड की दूसरी लहर में जब जनता ऑक्सीजन और अस्पताल ढूँढ रही थी, तब सरकार या तो गायब थी या प्रचार में व्यस्त। श्मशानों की कतारें और अस्पतालों की बदहाली आज भी लोगों के ज़हन में ज़िंदा हैं।
आठवाँ, 20 भारतीय जवानों की शहादत के बावजूद प्रधानमंत्री ने बयान दिया कि “ना कोई घुसा है, ना घुसा हुआ है।” यह बयान सिर्फ जनता को नहीं, बलिदान देने वाले सैनिकों को भी धोखा देने जैसा था।
नवाँ, महँगाई ने आम आदमी की थाली को भी छोटा कर दिया है। दाल, सब्ज़ियाँ, दूध — सब कुछ आम आदमी की पहुँच से बाहर होता जा रहा है, और सरकार सिर्फ अर्थव्यवस्था की ‘तेज़ रफ्तार’ के दावे कर रही है।
दसवाँ, महिला आरक्षण पर सालों से सिर्फ बयानबाज़ी होती रही। चुनाव के ऐन पहले आरक्षण की घोषणा और उसे 2029 के बाद लागू करने की बात — सिर्फ एक और चुनावी जुमला बनकर रह गया।
ग्यारहवाँ, CBI, ED जैसी संस्थाओं का उपयोग विपक्ष को डराने और दबाने में हुआ। संसद को चर्चा से नहीं, आदेश से चलाया गया। संविधान की आत्मा — संवाद और सहमति — को बार-बार कुचला गया।
अंत में, डॉ. तनुज खत्री ने कहा —
“देश अब तय करेगा कि वह प्रचार में उलझे रहना चाहता है या सच्चाई से आँख मिलाकर आगे बढ़ना। झारखंड अब नारे नहीं, न्याय माँग रहा है। जल, जंगल, ज़मीन और अस्मिता के लिए निर्णायक संघर्ष तय है।”


