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निधि कुलपति जी टीवी पत्रकारिता के उस शिखर पर हैं जहां छूने को और कोई ऊंचाई नहीं बचती

by Dayanand Roy

दयानंद राय

जब निधि कुलपति जी एनडीटीवी से जुड़ी थीं तो मैं उसके तीन साल बाद यानि वर्ष 2006 में पत्रकारिता का विद्यार्थी था। तब एनडीटीवी इसलिए देखता था क्योंकि लगता था कि यह चैनल पत्रकारिता में एक बेंचमार्क बना रहा है और हम जैसे विद्यार्थियों को इस चैनल के पत्रकारों और एंकरों से सीखना चाहिए।

हालांकि तब मेरा रूझान प्रिंट मीडिया की ओर अधिक था और अब भी है लेकिन तब भी मैं एनडीटीवी देखता था। आज जब एनडीटीवी से उनके रिटायर होने की खबर सोशल मीडिया की सुर्खियों में है तो अनायास मन में कई तरह के विचार आ रहे हैं, ऐसे समय में जब अमूमन हर पत्रकार आलोचना से अछूता नहीं है क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि निधि कुलपति जी के काम को, उनकी एंकरिंग को सम्मान से देखा जा रहा है।

उनके साथ काम कर रहे या चुके पत्रकार उन्हें और उनके काम को सराह रहे हैं और समाज के हर तबके में उनके काम को लेकर सम्मान है। आज के दौर में किसी पत्रकार के काम की आलोचना न होना किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है।

निधि कुलपति जी को खास क्या बनाता है

जहां तक मैं समझता हूं निधि कुलपति जी को खास उनका सादगीपूर्ण और शालीन व्यवहार। न्यूज एंकरिंग में संयत और शोर-गुल से परे जेहन में पैवस्त होनेवाली आवाज और उनका कांफिडेंस बनाता है। लंबे समय तक अपने व्यवहार और प्रस्तुति में एकतानता बनाये रखना और तब भी दर्शकों की आकांक्षाओं पर खरा उतरना कोई आसान काम नहीं है।

उन्हें एनडीटीवी पर देखते ही यह महसूस होने लगता था कि एंकरिंग के मानदंडों पर अगर कोई 100 फीसदी या सोलहों आना खरा है तो वो निधि जी हैं। अपूर्व भारद्वाज ने उनके बारे में ठीक कहा है कि वो कैमरे पर थीं, लेकिन कभी ‘कैमरा-लायक़’ बनने की कोशिश नहीं की। उनकी मौजूदगी शांत थी — लेकिन असर गहरा। जैसे पुराने रेडियो की आवाज़ — जिसमें कोई जल्दबाज़ी नहीं होती, पर जो दिल तक उतर जाती है।

उन्होंने कभी ऊँचा बोलने की ज़रूरत महसूस नहीं की, क्योंकि उनकी गरिमा ही उनकी ताक़त थी। निधि कुलपति केवल एक एंकर नहीं, बल्कि पत्रकारिता की उस शैली की प्रतिनिधि रहीं, जिसमें तेज़ी नहीं बल्कि गंभीरता और सादगी थी। उन्होंने न केवल ख़बरें पढ़ीं, बल्कि पत्रकारिता को जिया।

जिंदगी सबको मौका देती है पर सब माइलस्टोन नहीं बना पाते

निधि कुलपति जी ने अपने पत्रकारीय करियर में जो काम किया और जो योगदान दिया वो अमूल्य है। उन्होंने पत्रकारिता और एंकरों के लिए बिना कोई भाषण दिए सिर्फ अपने काम से वो कह दिया है कि उन्हें कैसा होना चाहिए। निधि कुलपति बनने के लिए चाहिए अपने काम के प्रति गहरा कमिटमेंट और वह प्लेटफार्म जहां अपने काम को आप बखूबी दर्शा सकें।

निधि कुलपति जी वो सब इसलिए कर सकीं क्योंकि एक तो उनमें अपने काम को लेकर कमिटमेंट था और दूसरा, उनकी प्रस्तुति को मंच देने के लिए एनडीटीवी जैसा चैनल मिला। ज्यादा कहना ज्यादा हो जायेगा तब भी यह कहना चाहता हूं कि निधि कुलपति जी टीवी पत्रकारिता के उस शिखर पर हैं जहां छूने को और कोई ऊंचाई नहीं बचती।

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