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क्या हरिवंश जी के किस्मत का सितारा फिर चमकेगा?

by Dayanand Roy

विवेकानंद सिंह कुशवाहा

कैलकुलेटेड रिस्क लेने के मामले में हरिवंश जी का कोई जोड़ नहीं रहा है। उन्होंने जब संपादक के रूप में प्रभात खबर को जॉइन किया था, तो मुश्किल से प्रभात खबर का सर्कुलेशन 200 से 500 कॉपी के बीच रहा होगा। उस संख्या को वे 10 लाख कॉपी तक पहुंचाने में कामयाब रहे। जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बन रहे थे, तो उन्होंने अपना एडिशनल मीडिया एडवाइजर बनने की इनको पेशकश की।

उस समय तक प्रभात खबर अपने अच्छे दौर में प्रवेश कर चुका था। प्रबंधन से पूरी आजादी मिली हुई थी। फिर भी उन्होंने अपने बलिया के लाल पीएम चंद्रशेखर के साथ जुड़ने का निर्णय लिया। छह महीने से कुछ ज्यादा समय तक वह चंद्रशेखर जी के साथ रहे। पीएम के साथ रह कर हरिवंश जी, देश की राजनीतिक लॉबी के ज्यादा करीब आ चुके थे।

प्रभात खबर प्रबंधन ने भी उनका इंतजार किया, उनसे बेहतर विकल्प भी प्रभात खबर के पास नहीं था। वह वापस प्रभात खबर से जुड़े। चारा घोटाले की खबरों को उन्होंने प्रमुखता से प्रकाशित किया। इस क्रम में जेपी आंदोलन के दिनों के साथी नीतीश कुमार से उनकी नजदीकी और बढ़ती गयी।

कुछ वर्षों बाद बिहार में नीतीश कुमार के अच्छे दिन आ गये थे। हरिवंश जी की सलाह को नीतीश कुमार गंभीरता से लेते रहे हैं। अंततः 2014 में उधर नरेंद्र मोदी जी देश के प्रधानमंत्री बने। इधर हरिवंश जी जदयू की ओर से राज्यसभा पहुंचे। अखबारों के मालिकों के राज्यसभा पहुंचने के काल में एक क्षेत्रीय अखबार के संपादक का राज्यसभा पहुंचना, मुझ जैसे पत्रकारिता के छात्र के लिए कौतूहल का विषय था।

हरिवंश जी किताबें बहुत पढ़ते हैं। उससे भी खास बात यह है कि वो रोचक अंदाज में उसकी किस्सागोई करते हैं। आज के दौर में नेताओं का दिल जीतने की यह सबसे बड़ी चाभी बन गयी है, क्योंकि नेताओं को आजकल पढ़ने की फुरसत मिल नहीं पाती। नीतीश जी इधर अलट-पलट जरूर करते रहे, लेकिन हरिवंश जी जान चुके थे कि इस समय भारत की राजनीति का मोदीकाल चल रहा है। राज्यसभा में रहकर हरिवंश जी, मोदी जी के दिल में भी अपनी छाप छोड़ते रहे। नतीजा यह हुआ कि 2018 में वह राज्यसभा के उपसभापति बना दिये गये।

मोदी जी के दिल को और भी बेहतर तरीके से जीतने के प्रयासों में वे डटे हुए हैं। इस समय हरिवंश जी ही हैं, जो उपराष्ट्रपति की कुर्सी से बस एक कदम की दूरी पर हैं। उनके राज्यसभा का दूसरा कार्यकाल अभी 2026 तक है। क्या उनका कैलकुलेटेड रिस्क उनको उपराष्ट्रपति भी बनवा देगा? देखते हैं क्या होता है!

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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