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राजद में मचेगी भगदड़! पार्टी के आधे से अधिक विधायकों के एनडीए के संपर्क में रहने का दावा

by Dayanand Roy

महेश कुमार सिन्हा

पटना : बिहार के राजनीतिक हलकों में इन दिनों राजद में बड़ी टूट की अटकलें जोर पकड़ती जा रही है। जदयू के मुख्य प्रवक्ता और विधान पार्षद नीरज कुमार के ताजे बयान से इन अटकलों को बल मिला है। नीरज कुमार ने यह कहकर बिहार में हड़कंप मचा दिया है कि राजद के 17-18 विधायक एनडीए के संपर्क में हैं।

गौरतलब है कि नीरज कुमार से पहले  एनडीए के  घटक दल लोजपा(रा) के प्रमुख और केन्द्रीय मंत्री चिराग पासवान  भी ऐसा दावा कर चुके हैं। इनके बयानों के बाद सियासी गलियारे में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया। सियासत के जानकारों का मानना है कि खरमास के बाद विधायकों के पाला बदल  का खेल शुरु हो सकता है। बिहार में लोग खरमास में कोई शुभ और नया काम नहीं करते हैं। 15 को खरमास खत्म  होने और दही-चूड़ा भोज के साथ ही बिहार में सियासी हलचल तेज होने की परंपरा रही है।

नीरज कुमार और चिराग पासवान दोनों जिम्मेदार व्यक्ति हैं, कोई भी बात ये हल्के में नहीं कहते। इसलिए उनके दावे को दरकिनार भी नहीं किया जा सकता। असल में महागठबंधन के  लगातार  दो बार असफल मुख्यमंत्री पद का चेहरा रहे तेजस्वी यादव के विधानसभा सत्र छोड़ कर विदेश भ्रमण पर जाने के बाद इस चर्चा ने और जोर पकड़ लिया है।

चूंकि वे विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं तो उनकी ज्यादा जरूरत सदन में पार्टी के विधायक महसूस कर रहे थे। खासकर वे विधायक, जो पहली बार जीत कर आए हैं। राजद के इस बार जीते 25 विधायकों में 17-18 तो पहली बार जीत कर विधानसभा आए हैं। सदन में उन्हें किस तरह का आचरण करना है और किस लाइन पर चलना है, यह बताने वाला उनका नेता तो शपथ ग्रहण के बाद से ही गायब है। तेजस्वी के दिल्ली जाने की जानकारी तो लोगों को मीडिया के माध्यम से तो हो गई थी।  पर, वे विदेश भ्रमण पर चले गए, इसकी कोई अधिकृत जानकारी किसी को नहीं है।

लोग ज्यादातर चर्चा उनके यूरोप जाने की कर रहे हैं। सियासत के जानकारों की मानें तो पहली बार निर्वाचित राजद के विधायकों ने अव्वल तो 25 की टुकड़ी में बैठने की कल्पना ही नहीं की होगी।  जिस अति आत्मविश्वास से तेजस्वी ने मुख्यमंत्री पद के अपने शपथ ग्रहण की 18 नवंबर की तारीख मुकर्रर की थी, उसमें सपने में भी कोई इसकी कल्पना नहीं कर सकता था। पर, सब कुछ उल्टा हो गया।

सदन की आचार-संहिता की समझ से लेकर सियासी गुर सिखाने वाला गुरु भी गायब हो गया। वे यह भी सोचते होंगे कि एनडीए सरकार से उनके लिए अपने क्षेत्र के काम कराने में कितनी मुश्किल आएगी। संभवतः उनकी ऐसी मन स्थिति को भांप कर ही मंत्री पद की शपथ के बाद रामकृपाल यादव ने आशंका जताई थी कि  तेजस्वी कहीं नेता प्रतिपक्ष लायक भी  न रह जाएं। वैसे बिहार में विधायकों का टूटना कोई नई बात नहीं है।

2020 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव के बाद बसपा के जमा खान जदयू में आ गए थे। चिराग पासवान के नेतृत्व वाली लोजपा के इकलौते विधायक ने भी जदयू का दामन थाम लिया था। बाद के दिनों मे वीआईपी के सभी चार विधायकों ने भाजपा से हाथ मिला लिया था। एनडीए तो सत्ता में था। उसकी पार्टियों के साथ सटना तो समझ में आता है, लेकिन सत्ता पाने का सपना दिखा कर राजद ने भी ओवैसी की एआईएमआईएम के 4 विधायक झटक लिए थे। ऐसे में इस बार बुरी तरह हार से संख्या बल में तेजस्वी कमजोर पड़े हैं।

ऐसी स्थिति में राजद अक्षुण्ण नहीं रह पाए तो इस पर आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए। विधायकों की संख्या छोटी रहने पर दल बदल कानून टूट को और आसान बना देता है। एक बात यह भी है कि नए विधायकों की निष्ठा पर उतना यकीन नहीं किया जा सकता। उधर जदयू को भी मलाल है कि चार विधायकों की कमी के कारण वह भाजपा से पिछड़ गई और दूसरे नंबर की पार्टी बनकर कर रह गई। जदयू की नजर भी एआईएमआईएम और राजद  के कुछ विधायकों के अलावा बसपा के एकमात्र विधायक पर  है।

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