
सुशोभित

स्वामी विवेकानन्द ईसा मसीह के बड़े प्रेमी थे! उन पर अपनी पुस्तिका ‘ईशदूत ईसा’ में उन्होंने ईसा मसीह के जीवन-चरित्र की विवेचना प्राच्य दृष्टिकोण से की है। प्राच्य शब्द प्राची से बना है, जिसका अर्थ होता है पूर्व दिशा।
अंग्रेज़ी में प्राच्य को ओरियंटल कहेंगे। अंग्रेज़ी में ओरियंटल का विपर्यय ऑक्सीडेंटल होता है। हिन्दी में प्राची का विपर्यय प्रतीची होगा। प्राची-प्रतीची का यह द्वैत इधर लोकप्रिय शब्दावली में पूर्व बनाम पश्चिम कहलाने लगा है।
स्वामी विवेकानन्द न केवल ईसा मसीह को प्राच्यदेशीय बतलाते हैं, बल्कि यह भी कहते हैं कि परमात्मा के सभी संदेशवाहक प्राच्यदेशीय ही रहे हैं, पश्चिम में कोई पैग़म्बर कभी अवतरित नहीं हुआ!
ईसा मसीह के अवतरण को स्वामी विवेकानन्द ने श्रीमद्भगवद्गीता के ‘यदा यदा हि धर्मस्य’ के आलोक में देखा है। गीता के ही दसवें अध्याय के 41वें श्लोक के माध्यम से उन्होंने यह भी संकेत किया है कि जहाँ कहीं भी किसी असाधारण शक्तिसम्पन्न एवं पवित्रात्मा को मानवजाति के उत्थान के लिए यत्नशील देखो तो यह जान लो कि वह परम-चेतना के ही तेज से उत्पन्न हुआ है। ईसा मसीह के प्रति विवेकानन्द की वेदान्ती-दृष्टि अभिनव थी।
ईसा मसीह पर स्वामी विवेकानन्द की पुस्तिका उनके एक व्याख्यान से निर्मित हुई है। उन्होंने यह व्याख्यान वर्ष 1900 में कैलिफ़ोर्निया में दिया था। पाश्चात्य श्रोताओं को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा कि “एशिया की आवाज़ धर्म की आवाज़ है, जबकि यूरोप राजनीति की भाषा बोलता है। अपने-अपने क्षेत्र में दोनों महान हैं।
किन्तु अंतर यह है कि पश्चिम ऐहिक सौन्दर्य पर आसक्त है, जबकि पूर्व के जन इहलोक की वस्तुओं को तिरस्कार से देखते हुए किसी ऐसी वस्तु के दर्शन की चिर अभिलाषा से भर उठते हैं, जो नित्य, अविनाशी और आनन्दपूर्ण हो। प्राची के महापुरुषों का मूलमंत्र यही रहा है कि यह जीवन कुछ नहीं है, इससे भी उच्च कुछ और है।”
ईसा मसीह के प्रति स्वामी विवेकानन्द की दृष्टि की अभिनव रचनात्मकता कुछ ऐसी है कि वे उनके त्याग और वैराग्य के उपदेश को अनासक्ति और अपरिग्रह के भारतीय-मूल्यों से जोड़ देते हैं।
स्वामी जी कहते हैं कि “महात्मा ईसा में देहज्ञान नहीं था, स्त्री-पुरुष भेदबुद्धि नहीं थी, वे अपने को लिंगोपाधिरहित जानते थे। वे वास्तव में विदेह, शुद्ध-बुद्ध-मुक्त आत्मस्वरूप थे।” आपने पहले कब जीसस क्राइस्ट के लिए इस तरह की शब्दावली का प्रयोग सुना था? किन्तु स्वामी जी ये बातें 125 वर्ष पूर्व कह गए हैं!
ईसा मसीह के सुप्रसिद्ध कथनों, यथा- “स्वर्ग का राज्य तुम्हारे ही भीतर विराजमान है”, “शुद्ध-हृदय व्यक्ति धन्य हैं”, “मैं अपने पिता में वर्तमान हूँ, तुम मुझमें हो और मैं तुममें हूँ”, “तुम सब उस परात्पर की सन्तान हो”, “आत्मा ईश्वर का नि:श्वास है” आदि की व्याख्या स्वामी विवेकानन्द ने औपनिषदिक परिप्रेक्ष्यों में की है।
ईसा मसीह को यवन, विधर्मी, विदेशी, पश्चिमी, पराया समझकर उनके संदेश से घृणा करने वालों ने क्या कभी हमारे अपने स्वामी विवेकानन्द के इन वचनों को पढ़ देखने का कष्ट किया है?
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।


