राहुल सांकृत्यायन जिनकी विद्वता के समक्ष आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी भी नतमस्तक थे

Dayanand Roy
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हिन्दी साहित्य की जिन विभूतियों से मैं प्रेरणा ग्रहण करता रहा उनमें से एक महापंडित और अथक घुमक्कड़ राहुल सांकृत्यायन भी हैं। असाधारण प्रतिभा के धनी राहुल सांकृत्यायन का पांडित्य किसी परिचय का मोहताज नहीं है। 36 भाषाओं के ज्ञाता और त्रिपिटकाचार्य महापंडित राहुल सांकृत्यायन के संबंध में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने एक बार कहा था कि मैं गोष्ठियों, समारोहों और सम्मेलनों में वैसे तो बेधड़क बोलता हूं पर जिस सभा, सम्मेलन और गोष्ठी में महापंडित राहुल सांकृत्यायन होते हैं वहां बोलने में सहमता हूं।

उनके व्यक्तित्व और उनकी आगाध विद्वता के समक्ष अपने को बौना महसूस करता हूं। यह उनका कथन है जिनके संबंध में यह सर्वविदित है कि वे हिन्दी के असाधारण वक्ता और विद्वान थे। राहुलजी के अध्ययन और लेखन का फलक इतना विशाल है कि ताज्जुब होता है कि इस महापंडित ने कॉलेज की देहरी भी नहीं छुई थी और अपने स्वाध्याय तथा सीखने की उत्कंठा से उन्होंने उस विपुल और मौलिक साहित्य का सृजन किया जिसका कोई जोड़ नहीं। राहुल सांकृत्यायन हिन्दी में यात्रा साहित्य के पितामह कहे जाते हैं।

हिन्दी साहित्य का जो तलस्पर्शी ज्ञान राहुल जी ने अर्जित किया उसकी तुलना किसी अन्य से नहीं की जा सकती। हिन्दी के संबंध में उन्होंने कहा था कि हिन्दी अंग्रेजी के बाद दुनिया के अधिक संख्यावाले लोगों की भाषा है। इसका साहित्य 750 ईस्वी से शुरू होता है। इसका भविष्य अत्यंत उज्जवल और भूत से भी अधिक प्रशस्त है। राहुल जी हिन्दी साहित्य को अनंत काल तक याद रखी जानेवाली सामग्री दे सके तो इसके पीछे उनका समर्पण था, प्यार था और इसी प्यार ने उन्हें अमरता दी। उनका पूरा जीवन साहित्य को समर्पित था।

उन्होंने सीखने से कभी परहेज नहीं किया और जो कुछ भी सीखा, उसमें डूबकर सीखा और पैठकर सीखा। राहुल जी ने किशोरावस्था पार करने के बाद ही लिखना शुरू कर दिया था। और जिस तरह घुमक्कड़ी के लिए उनके पांव नहीं रुके उस तरह लेखनी भी नहीं रुकी। राहुल जी साहित्य की विविध विधाओं के ज्ञाता हो सके तो इसकी वजह विश्व साहित्य के प्रति उनकी गहरी श्रद्धा थी।

वह साहित्य चाहे इतिहास से संबंधित हो या पुरातत्व से, अध्यात्म से संबंधित हो या संस्कृति से सबको वे शोधार्थी की तरह खंगालते रहे। राहुल जी ने इतिहास, पुरातत्व, परंपरा, व्यतीत और अतीत को निजी विवेचना दी। बोलियों और जनपदीय भाषाओं का सम्मान भी राहुल जी करते थे। भोजपुरी उन्हें विशेषकर प्रिय थी क्योंकि यह उनकी अपनी माटी की भाषा थी।

ज्ञान के प्रति पिपासा और जन चेतना के प्रति निष्ठा ने राहुल जी को वह प्रभा मंडल दिया जिसे मापना किसी आलोचक के सार्मथ्य से परे है। छुटपने में ब्याह के बाद घर छोड़कर भागनेवाले राहुल जी का असली नाम केदारनाथ पांडेय था। बाद में उन्होंने दो शादियां और की जिनमें से एक रुसी महिला ऐलेना और दूसरी कमला सांकृत्यायन से हुई। सन 1923 से उनकी विदेश यात्राओं का सिलसिला शुरू हुआ और फिर इसका अंत उनके निधन के साथ हुआ। राहुल जी ने चार बार तिब्बत की यात्रा की और वहां से प्रभूत सामग्री लेकर लौटे।

उनकी इस सामग्री की वजह से हिन्दी भाषा और साहित्य के इतिहास में कई पूर्व निर्धारित मान्यताओं और निष्कर्षों में परिवर्तन होना शुरू हो गया। राहुल जी जिज्ञासु तथा तथ्यान्वेषी प्रवृति के व्यक्ति थे इसलिए उन्होंने हर धर्म के ग्रंथों का अध्ययन किया और धर्म, दर्शन, लोक साहित्य, यात्रा साहित्य, इतिहास और राजनीति तथा प्राचीन ग्रंथों के संपादन में उल्लेखनीय कार्य किया।

दक्षिण भारत की यात्रा के क्रम में उन्होंने संस्कृत ग्रंथों का अध्ययन किया तो तिब्बत यात्रा के दौरान पाली ग्रंथों का। लाहौर यात्रा के दौरान उन्होंने अरबी भाषा सीखी और इस्लामी धर्म ग्रंथों का अध्ययन किया। अपने कृतित्व से उन्होंने अपने महापंडित होने की उपाधि को सार्थकता दी। उन्हें नमन।…!!

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