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बीपी शरण : तुम एक झूठे आदमी हो, तुम क्या खाक पत्रकारिता करोगे

by Dayanand Roy

नवेन्दु उन्मेष

रांची : वर्ष 1978-79 में रांची से जनता टाइम्स नामक साप्ताहिक अखबार का प्रकाशन शुरू हुआ। संपादक थे शारदा रंजन पांडे. वहां काम करने पत्रकारों में शामिल थे एस एन विनोद, धर्मराज राय, बीपी शरण।

चूंकि पिताजी के लिखे फीचर इत्यादि लेकर उस दफ्तर में सप्ताह में एक दो दिन मेरा आना-जाना लगा रहता था इसलिए मैं कुछ लोगों को जानने लगा था।

वहां आने जाने के दौरान ही मुझे पता चला कि एस एन विनोद कभी भारत मोटर में कंडक्टर हुआ करते थे। धर्मराज राय शिक्षक की नौकरी छोड़कर पत्रकारिता करने आये हैं।

एक दिन कि बात है कि शारदा रंजन पांडे को एक युवक को डांटते देखा। वे बहुत गुस्से में उस युवक को कह रहे थे तुम एक झूठे आदमी हो तुम क्या खाक पत्रकारिता करोगे। इसी दिन से मैं जाना कि ये वीपी शरण हैं।

बाद में मुझे पता चलाकि शारदा रंजन पांडे के कहने पर स्टेट्समैंन के संपादक एस सहाय ने बीपी शरण को रांची में रिपोर्टर के रूप में रख लिया है। उस दफ्तर में आने जाने के दौरान ही मुझे यह भी पता चलाकि रांची एक्सप्रेस के पहले संपादक शारदा रंजन पांडे थे।

जब तक वे रांची एक्सप्रेस के संपादक रहे उन्होंने संपादक के रूप में अपना नाम छपने नहीं दिया। कारण पता चला पांडेजी विशुद्ध कांग्रेसी विचारधारा के हैं और सीताराम मारू जनसंघी।

1991 के अप्रैल माह में देशप्राण का प्रकाशन एक रविवारी अखबार के रूप में शुरू हुआ। मैं वहां फरवरी माह से काम कर रहा था. शुरू के दिनों में मात्र हम तीन पत्रकार आफिस आया करते थे। बलबीर दत्त, देवनंदन और मैं।

वही बहुत दिनों के बाद मैंने बीपी शरण को देखा। तब वे डाक्टर भी हो चुके थे और संत जेवियर कालेज में प्रोफेसर भी। रविवारी देशप्राण में उनका नाम सलाहकार संपादक के रूप में छपना शुरू हुआ।

एक दिन मेरे द्वारा लिखे गये दूध शब्द को उन्होंने शुद्ध करते हुए दुध कर दिया तो मैं समझ गया कि बलबीर दत्त को अच्छी हिन्दी लिखने वाले पत्रकारों कि नहीं चमचों की जरूरत है।

वैसे मेरे बाद देशप्राण में प्रभाकर भट्ट, श्याम किशोर चौबे, संपूर्णानंद भारती, परमानंद ठाकुर, सतीश वर्मा, कलावंती सिंह सुमन, ओमरंजन मालवीय उर्फ महिपाल शर्मा, सुनील सिंह भी आये। वर्तमान में इनमें से कई लोग झारखंड के अच्छे पत्रकारों के रूप में गिने जाते हैं।

वैसे मेरा मानना है कि बीपी शरण एक अच्छे पत्रकार थे। उनके द्वारा स्टेट्समैन में लिखे गए कई फीचर को मैंने पढ़ा. बाद के दिनों में मैंने उन्हें एक अच्छी अंग्रेजी लिखने वाले पत्रकार के रूप में देखा। चेहरे पर बुलगारी कट दाढी और हंसमुख चेहरा उनकी पहचान थी। उन्हें मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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