अबुआ संथाल समाज भारत दिशोम का दूसरा स्थापना दिवस संपन्न, शिक्षा और संस्कृति संरक्षण का लिया संकल्प

हजारीबाग में अबुआ संथाल समाज भारत दिशोम के दूसरे स्थापना दिवस पर शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों के संरक्षण का संकल्प लिया गया तथा मेधावी छात्रों को सम्मानित किया गया।

Dayanand Roy
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Abua Santhal Samaj Bharat Dishom: महात्मा गांधी स्टेडियम, उरीमारी में ‘अबुआ संथाल समाज भारत दिशोम’ का दूसरा स्थापना दिवस पारंपरिक उत्साह, सांस्कृतिक गौरव और सामाजिक जागरूकता के साथ मनाया गया। कार्यक्रम में संथाल समाज के बुद्धिजीवियों, छात्र-छात्राओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न क्षेत्रों से आए लोगों की बड़ी भागीदारी देखने को मिली। आयोजन को केवल स्थापना दिवस तक सीमित न रखकर समाज के शैक्षणिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विकास के लिए संकल्प दिवस के रूप में मनाया गया।

कार्यक्रम के आयोजक एवं संगठन के मांझी हाड़ाम बिनोद किस्कू ने कहा कि किसी भी समाज की असली पहचान उसकी भाषा, संस्कृति, परंपरा और सामाजिक मूल्यों से होती है। यदि आने वाली पीढ़ियों तक इन धरोहरों को सुरक्षित नहीं पहुंचाया गया, तो समाज की पहचान कमजोर पड़ सकती है। उन्होंने कहा कि संगठन इसी उद्देश्य को लेकर लगातार कार्य कर रहा है।

स्थापना दिवस के अवसर पर उपस्थित लोगों ने संथाली भाषा, संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक मूल्यों के संरक्षण एवं संवर्धन का सामूहिक संकल्प लिया। साथ ही बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ धार्मिक, नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने पर भी जोर दिया गया, ताकि वे अपनी जड़ों से जुड़े रहकर बेहतर भविष्य का निर्माण कर सकें।

कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण आकर्षण मेधावी छात्र-छात्राओं का सम्मान रहा। माध्यमिक और इंटरमीडिएट परीक्षाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को मंच पर सम्मानित किया गया। इस दौरान संगठन की ओर से आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन प्रतिभाशाली छात्रों की आगे की शिक्षा में सहयोग देने की घोषणा भी की गई। वक्ताओं ने कहा कि शिक्षा समाज को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने का सबसे प्रभावी माध्यम है।

अपने संबोधन में बिनोद किस्कू ने चिंता जताई कि आदिवासी और मूलवासी क्षेत्रों के कई हिस्सों में आज भी शिक्षा का स्तर अपेक्षित स्थिति तक नहीं पहुंच पाया है। उन्होंने समाज के जागरूक लोगों से बच्चों को शिक्षा से जोड़ने और उन्हें बेहतर अवसर उपलब्ध कराने में सहयोग करने की अपील की।

समारोह की शुरुआत पूर्वजों और महापुरुषों को श्रद्धांजलि अर्पित कर की गई। उपस्थित लोगों ने उनके चित्रों पर पुष्प अर्पित कर उनके योगदान को याद किया और उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लिया। कार्यक्रम के दौरान पारंपरिक वाद्ययंत्रों, तीर-धनुष, सांस्कृतिक प्रतीकों और पारंपरिक परिधानों ने संथाल संस्कृति की समृद्ध विरासत को जीवंत कर दिया।

समारोह में उपस्थित वक्ताओं ने युवाओं से अपनी मातृभाषा, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक मूल्यों को अपनाने का आह्वान किया। साथ ही समाज के विकास, शिक्षा के प्रसार और सामाजिक एकता को मजबूत करने के लिए मिलकर कार्य करने पर बल दिया गया।

स्थापना दिवस का यह आयोजन समाज को शिक्षित, संगठित और सांस्कृतिक रूप से मजबूत बनाने की दिशा में एक प्रेरणादायी पहल के रूप में सामने आया, जिसने युवाओं में नई ऊर्जा और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना का संचार किया।

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