महाश्वेता देवी का दूसरा घर था पलामू, पनेरीबांध भी गईं थीं

Dayanand Roy
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महान साहित्यकार की आज सौवीं जयंती है

प्रभात मिश्रा

उस दिन महाश्वेता देवी भंडरिया के एक गांव में थीं। उन्होंने एक महिला से पूछा, ‘आज का खाया है’। इस पर महिला का जवाब था, ‘गेंठी आऊ सरई खईले ही मईंया’। ये दोनों चीजें महाश्वेता देवी के लिए नई थीं।

साथ में पलामू के वरिष्ठ पत्रकार रामेश्वरम भी थे। वह अपनी ‘दीदी’ (महाश्वेता देवी) को बताते हैं, ‘ये जंगली कंद-मूल है। पौधों की जड़ी, इस महिला ने इसे उबाल कर खाया है।’ इस पर दीदी बोल पड़ती हैं, ‘इतनी गरीबी…दर्दनाक।’

आज महाश्वेता देवी की सौंवी जयंती है। बांग्ला की इस महान लेखिका का पलामू से गहरा जुड़ाव था। यूं कहें कि पलामू उनका दूसरा घर था तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। महुआमिलान, मैक्लुस्कीगंज होते हुए वह पलामू आईं और डालटनगंज के एक चौपाल में कहा, ‘पलामू स्वयं में भारत है, भारत का आईना है’।

उनकी कही हुई यह बात वर्षों तक क्रांति कुटीर के सामने शिवाजी मैदान की दीवार पर लिखी हुई थी। वह मेरे गांव पनेरीबांध भी आठ, नौ अप्रैल 1984 को आयोजित ‘बंधुआ मुक्ति चौपाल ‘ में भाग लेने पहुंचीं थीं।

एक बार महाश्वेता देवी रामेश्वरम जी के यहां आई थीं। जानकारी मिलते ही मैं तुरंत वहां पहुंच गया। ‘चचा हमरा महाश्वेता जी से मिलेला बा’ मेरे यह कहते ही वह तुरंत मुझे भीतर के कमरे में ले गए और महाश्वेता जी से कहा, ‘ये प्रभात सुमन हैं, छात्र नेता रहे हैं, अभी पत्रकार हैं।’

इसके बाद महाश्वेता जी ने थोड़ी देर बातें की और कहा, ‘जब मौका मिले तब पलामू पर लिखना।’ आज जब भी पलामू पर कुछ लिखता हूं तो महाश्वेता जी और रामेश्वरम जी बहुत याद याते हैं।

प्रो. सुभाष चंद्र मिश्रा टाउनहॉल के एक कार्यक्रम में थे। लोग मंच पर महाश्वेता देवी की तारीफ कर रहे थे। उन्हें यह अच्छा नहीं लग रहा था। जब प्रो. मिश्रा की बारी आई तो उन्होंने कहा, ‘मैं आपकी तारीफ नहीं कर रहा हूं।

मैं आपके लेखन की तारीफ कर रहा हूं। आप साहित्य, सौम्यता और संघर्ष की संगम हैं। आपका लेखन समाज को नई दिशा दिखाता है, आपकी सौम्यता लोगों को आकर्षित करती है और आपका संघर्ष लोगों को जीने की प्रेरणा देता है।’

महाश्वेता देवी के साथ रामेश्वरम के बाद सबसे ज्यादा समय बिताने का मौका बलराम तिवारी जी को मिला है। पेशे से अधिवक्ता बलराम जी कहते हैं, ‘मैं कई गांवों नेऊरा, सेमरा, पनेरीबांध, भंडरिया व न जाने कितने और में दीदी के साथ रहा।

वह टूटी-फूटी हिंदी बोलतीं थी। पलमूआ बोली भी समझ जाती थी। जहां नहीं समझ पातीं थी वहां रामेश्वरम जी को माने बताने के लिए कहतीं थी। एक बार एक वृद्ध महिला ने कहा-‘का कहूं दीदी उठे-बईठे में ना बनला, इसपर महाश्वेता ने कहा-लाठी रखा करो, उठने-बैठने में भी काम देगा और जानवर व लोगों को भगाने में भी काम देगा।’

बलराम जी के अनुसार, ‘दीदी, पलामू के लोगों को नई राह दिखा कर गई हैं। अगर वह कम समय के लिए पलामू आतीं तो रामेश्वरम जी शिवाजी मैदान में ही चौपाल लगा देते थे। इस चौपाल में मजदूर, ग्रामीण से लेकर बुद्धिजीवी वर्ग के लोग बड़ी संख्या में मौजूद रहते थे।’

रवींद्र त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्होंने महाश्वेता देवी का साक्षात्कार तब लिया था जब वे जनसत्ता, दिल्ली में कार्यरत थे। त्रिपाठी जी बताते हैं, ‘महाश्वेता बेबाक और साफगोई से अपनी बात रखतीं थी। उन्होंने झांसी की रानी और भगवान बिरसा मुंडा को आधार बना कर कई रचनाएं लिखीं। इनमें महिला और आदिवासी समाज के संघर्ष की झलक साफ दिखती है।

जब उन्हें पता चला कि मैं पलामू से हूं तो आत्मीयता और बढ़ गई। उन्होंने बंधुआ मुक्ति चौपाल से लेकर पलामू की कई घटनाओं का का जिक्र किया।’ रवींद्र त्रिपाठी जी ने इस महान लेखिका का इंटरव्यू दूरदर्शन के लिए भी लिया था।

एक बार डालटनगंज के टाउन हॉल में ‘जंगल के दावेदार’ नाटक का मंचन हो रहा था। यह महाश्वेता देवी की महान कृतियों में से एक है। इस नाटक का रुपांतरण और निर्देशन उपेंद्र मिश्र (वर्तमान में इप्टा के झारखंड महासचिव) ने किया था। उपेंद्र जी के शब्दों में, ‘महाश्वेता जी ने मिलने के बाद कहा कि अपनी कृति का नाट्य रुपांतरण विस्मित करने वाला है। मुझे नहीं लगता था कि इसका इस तरह से मंचन भी हो सकता है। नाटक देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा, मैं पूरी टीम को बधाई देती हूं।’

सैकत चटर्जी आज रंगमंच और फोटोग्राफी के चर्चित नाम हैं। उन्हें भी रामेश्वरम ने ही महाश्वेता देवी से यह कहते हुए मिलवाया था, ‘ई सैकत हव दीदी। फोटो खींच हव, नाटककार हव।’ सैकत कहते हैं, ‘इस मुलाकात में तो कुछ खास नहीं हुआ। किसी ने मेरे कैमरे से ही उनके साथ मेरी तस्वीर ली और मैं वहां से चला आया। अगले दिन मैं अपनी खींची तस्वीरें लेकर उनके पास पहुंचा।

इन्हें देखकर उन्होंने जो प्रतिक्रिया दी वह मेरा उत्साह बढ़ाने वाली थीं। उन्होंने कहा था-तुम्हारे फोटो में तो पूरा पलामू दिखता है।’ सैकत ‘जंगल के दावेदार’ के मंचन के समय वहां मौजूद थे। वह कहते हैं, ‘महाश्वेता जी ने नाटक देखने के बाद कहा कि लिखे तो सोचा भी नहीं था कि पलामू के भाई लोग इसका मंचन करेंगे। इस दौरान उन्होंने कहा था कि अन्याय हो रहा है, इसी पर बात की जानी चाहिए।’

शंभू चौरसिया पलामू के वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह कहते हैं, ‘मैं पहली बार पनेरीबांध में आयोजित बंधुआ मुक्ति चौपाल के समय उनसे मिला था। मिलाने वाले रामेश्वरम जी ही थे। महाश्वेता जी मिलने के बाद लोगों का उत्साह बढ़ातीं थी। पलामू के प्रति उनका गहरा लगाव था जिसे यहां के लोग कभी नहीं भूल सकते हैं।’

झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार किसलय जी पनेरीबांध में हुए चौपाल की रिपोर्टिंग के लिए आए थे। उन्होंने ने कहा, ‘उस वक्त मैं टेलीग्राफ के लिए काम करता था। इस चौपाल में मेरे साथ इस अखबार की तवलीन सिंह रिपोर्टिंग के लिए गईं थीं।

वरिष्ठ पत्रकार उत्तम सेन गुप्ता सहित कई नामी-गिरामी पत्रकार कवरेज के लिए मौजूद थे। चौपाल की खबरें राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी खूब चर्चित हुईं थी।’ उन्होंने महाश्वेता देवी के साथ-साथ रामेश्वरम को भी संजीदगी से याद किया।

असु प्रीत का नाता महाश्वेता देवी के साथ फुआ-भतीजी वाला रहा है। वह रामेश्वरम जी की बेटी हैं। पनेरी बांध में हुए बंधुआ मुक्ति चौपाल की चर्चा करते हुए सारा दृश्य उनकी आंखों के सामने घूमने लगता है। वह कहती हैं, ‘यहां मैं फुआ के साथ साए की तरह मौजूद थी।

पत्रकारों से मिलवाने से लेकर दुभाषिए तक की भूमिका थी मेरी। फुआ को तालाब (फरबी बांध) के किनारे का दृश्य बहुत अच्छा लग रहा था। इस दौरान वह लोगों के साथ में ही खाती थीं और बरतन भी धोती थीं।’ असु प्रीत जी के लिए रांची स्टेशन का दृश्य अभी भी नहीं भूलता है। वह कहती हैं, ‘स्टेशन के स्टॉल से कैमरा खरीद कर फुआ ने उन्हें गिफ्ट किया था। इसे पाकर मैं बहुत उत्साहित हुई थी।’

महाश्वेता देवी का जन्म 14 जनवरी 1926 को अविभाजित भारत के ढाका (अब बांग्लादेश) में हुआ था। 28 जुलाई 2016 को उन्होंने कोलकाता में आखिरी सांस ली। आदिवासी, दलित, वंचित समुदाय के लिए जीवन भर लिखने वाली और संघर्ष करने वाली इस महान लेखिका को सादर नमन।

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