
स्वामी दिव्य ज्ञान

रांची : राजनीति में हर व्यक्ति प्रभाव जमाने का प्रयास करता है, यह कोई असामान्य तथ्य नहीं है। पर भाजपा के वर्तमान संगठन मंत्री की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठे हैं और इतनी तीव्रता से उठे हैं कि संगठन के भीतर असहजता स्वाभाविक है। इसके बावजूद यह भी सच है कि इसी प्रक्रिया में कुछ ऐसे निर्णय सामने आए हैं, जिन्हें पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।

रांची महानगर में वरुण साहू का जिला अध्यक्ष बनना एक सकारात्मक संकेत है। वे योग्य, समझदार और संगठनात्मक कार्यों में सक्रिय माने जाते हैं। ऐसे चेहरे बताते हैं कि हर निर्णय गलत नहीं है।
वहीं, रामगढ़ में मंडल स्तर पर स्वीकार्य और ओबीसी समाज से आने वाले विजय जायसवाल को दरकिनार कर जिस व्यक्ति को जिम्मेदारी दी गई है, उसे संगठन के भीतर व्यापक विरोध का सामना करना पड़ सकता है। यहां चुनौती केवल पद संभालने की नहीं, बल्कि भरोसा स्थापित करने की होगी।
गढ़वा में उदय कुशवाहा को जिला अध्यक्ष बनाना ओबीसी वोट बैंक को बनाए रखने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। गुमला में यदि मनीर उरांव को जिला अध्यक्ष बनाया जाता है तो यह पार्टी की उस परंपरागत नीति के विरुद्ध माना जाएगा, जिसमें 60 वर्ष से कम आयु के सक्रिय और ऊर्जावान कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देने की बात होती रही है। यह निर्णय परिपाटी के पालन से अधिक उसके विरोध का उदाहरण बनता दिख रहा है, जबकि मंडल स्तर पर प्रभावशाली विकल्प मौजूद थे।
गिरिडीह में रंजीत राय का जिला अध्यक्ष बनना भी केवल प्रदेश या जिला नेतृत्व के प्रभाव का परिणाम नहीं माना जा रहा। सूत्रों के मुताबिक, इसमें उनके ससुराल पक्ष की केंद्रीय स्तर पर मजबूत पकड़ और पुराने योगदान की भूमिका अहम रही है। इसलिए इसे स्थानीय संगठन की स्वाभाविक पसंद से अधिक केंद्रीय हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है, न कि जमीनी संगठनात्मक सहमति के रूप में।
सिमडेगा की स्थिति तो और भी सवाल खड़े करती है। सूत्रों के मुताबिक यहां जिस नाम की चर्चा है, वह कांग्रेस के वर्तमान विधायक के नजदीकी माने जाते हैं। इससे जुड़ी कुछ तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं, जो राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। यदि ये तथ्य सही हैं तो यह निर्णय केवल संगठनात्मक नहीं, बल्कि राजनीतिक विरोधाभासों को जन्म देने वाला माना जाएगा।
रामगढ़ जिले में राकेश प्रसाद का प्रभाव साफ तौर पर दिखता है। कुल मिलाकर लगभग हर जिले में किसी न किसी व्यक्ति, वर्ग या समीकरण की छाया स्पष्ट नजर आती है। यह वास्तविकता अब छिपी नहीं रह गई है।
अब भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए यह समय नहीं है कि वे केवल यह बहस करें कि कौन बना और किसके प्रभाव से बना। अब असली चुनौती यह है कि जो जिम्मेदारी में आए हैं, उन्हें संगठन के हित में कैसे काम करने को बाध्य किया जाए और सामूहिक प्रयास से पार्टी को मजबूत किया जाए। लड़ाई आपसी नहीं, राजनीतिक है, और वही दृष्टि आज झारखंड भाजपा के लिए सबसे आवश्यक है।


