आयुष द्विवेदी की ध्रुपद साधना, मीर बसु की रूहानी सूफ़ी गायकी और बीएचयू टीम के कालबेलिया नृत्य ने दर्शकों को एक अनोखी सांस्कृतिक यात्रा पर ले गया
रांची : रांची : ध्रुपद गायन की गम्भीरता, सूफ़ी संगीत की रूहानियत और कालबेलिया नृत्य की उन्मुक्त लोक-लय—इन तीनों का ऐसा सुंदर संगम सोमवार की रात नेतरहाट श्री महोत्सव की सांस्कृतिक संध्या में देखने को मिला, जो दर्शकों को एक अनोखी संगीतमय यात्रा पर ले गया —एक ऐसी यात्रा, जहां से कोई लौटना नहीं चाहता था।

अवसर था गुरुकुल परंपरा वाले नेतरहाट विद्यालय के पूर्व छात्रों द्वारा, पूर्व छात्रों के लिए आयोजित वार्षिक नेतरहाट श्री 2025 सांस्कृतिक संध्या का, जो हर वर्ष स्कूल दिवस पर राष्ट्रीय स्तर के कलाकारों को झारखंड के दर्शकों से परिचित कराता है।
कार्यक्रम की शुरुआत हुई गुरुकुल परंपरा से ही निकले युवा कलाकार आयुष द्विवेदी और उनकी टीम की भावपूर्ण ध्रुपद प्रस्तुति से—जो भारतीय शास्त्रीय संगीत की सबसे प्राचीन और गरिमामय शैली मानी जाती है। प्रस्तुति से पहले आयुष ने कहा कि ध्रुपद तानसेन और स्वामी हरिदास की परंपरा है; यह वैदिक गायन है, जो वेदों से उपजा है। इसके बाद उन्होंने राग मलकौंस में “शंकर हर हर महादेव…” से श्रोताओं को बाँध लिया। डमरू और चलते बाणों का उनका संगीतमय चित्रण सभागार में सिहरन-सी अनुभूति जगा गया।
फिर “कारे कारे नैना बाण चलाए…” की प्रस्तुति ने टीम की सधी हुई लयकारी और साधना का परिचय दिया। इसके बाद आयुष और उनकी टीम ने राग देश पर आधारित “वंदे मातरम्” प्रस्तुत कर माहौल को देशभक्ति की भावनाओं से भर दिया। यह वही टीम है जिसने वंदे मातरम् के 100 वर्ष पूरे होने पर प्रधानमंत्री के समक्ष इसकी प्रस्तुति दी थी। उनकी स्वर-साधना, आलाप की गंभीरता और भावपूर्ण प्रस्तुति ने सभागार में एक अलौकिक शांति और गरिमा भर दी।
इसके बाद मंच संभाला राजस्थान के मीर बसु ने, जिन्होंने अपनी प्रभावशाली सूफ़ी गायकी से पूरे हॉल में रूहानी वातावरण रच दिया। उनके तरन्नुम में प्रेम, भक्ति और मानवता की झलक थी, जिसने दर्शकों को भीतर तक छू लिया। उन्होंने पहले “केसरिया बालम पधारो म्हारे देश…” से समां बाँधा, फिर “संतों ऐसा देश हमारा…” की सूफ़ियाना प्रस्तुति से मन मोह लिया। इसके बाद जब उन्होंने “दमादम मस्त कलंदर…” गाया तो हॉल में बैठे हर श्रोता झूमने लगा। उनकी प्रस्तुति इतनी लोकप्रिय रही कि दर्शक उनसे और सुनने के ख्वाहिशमंद थे पर एक और धमाकेदार परफोरमेंस देनेवाली टीम अपनी बारी का इंतजार कर रही थी।
इसके बाद बारी थी बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की शिखा रमेश के नेतृत्व वाली टीम की। टीम की सदस्य प्रिया, राधिका, मौमिता और आभासिका ने आठ मिनट की मोहक प्रस्तुति में राजस्थान का प्रसिद्ध कालबेलिया नृत्य प्रस्तुत किया—वह लोकनृत्य शैली जिसे यूनेस्को ने अपनी अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल किया है।घूमर की तेज़ घूम, लहराती चुनरियाँ, साँप-सरीखे लचीले भाव, वाद्य-ताल की ऊर्जा और मंच पर फैलती रेगिस्तानी चमक ने दर्शकों को रोमांचित कर दिया।
अब मौका था कलाकारों के सम्मान का। नेतरहाट ओल्ड ब्यॉयज एसोसिएशन, रांची चैप्टर के अध्यक्ष डॉ अखिलेश चौधरी ने (नोबा) के पदाधिकारियों के साथ उन्हें अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया। कार्यक्रम में मंच संचालन नवीन कुमार ने किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ नेतरहाट स्कूल के विद्यालय गान वंदे हे सुंदर मम सखा नेतरहाट से हुआ और समापन नोबा, रांची चैप्टर के अध्यक्ष डॉ अखिलेश चौधरी के समापन वक्तव्य से । इससे पहले कार्यक्रम में आए अतिथियों का स्वागत नोबा रांची चैप्टर के सचिव सुनील चंद्रा ने दिया। आयोजन को सफल बनाने में पूर्व छात्र रमानिवास, ज्ञान सौरभ और आभा का योगदान रहा। कार्यक्रम में नेतरहाट स्कूल के पूर्व छात्र और शिक्षक सपरिवार बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

