विपक्षी दलों ने आरएसएस प्रमुख भागवत पर ‘दो तरह की बातें’ करने का आरोप लगाया

Dayanand Roy
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नयी दिल्ली: विपक्षी दलों ने विभिन्न मुद्दों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत के विचारों की आलोचना की और उन पर ‘‘दो तरह की बातें’’ बोलने का आरोप लगाया, जबकि मुस्लिम विद्वानों ने एकता के उनके आह्वान का स्वागत करते हुए कहा कि दोनों पक्षों की ओर से गलतफहमियां दूर की जानी चाहिए।

आरएसएस की सौम्य और आधुनिक छवि पेश करते हुए भागवत ने बृहस्पतिवार को कहा कि भारत में इस्लाम के लिए हमेशा जगह रहेगी। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ मतभेद की अटकलों को खारिज करते हुए कहा कि अखंड भारत एक अपरिवर्तनीय वास्तविकता है।

ढाई घंटे के प्रश्नोत्तर सत्र में भागवत ने मनुस्मृति से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), अमेरिकी टैरिफ से लेकर जाति, शिक्षा, देशभक्ति, राष्ट्रभाषा, विभाजन, अवैध आव्रजन, मुसलमानों पर हमले और सबसे महत्वपूर्ण, नेताओं की सेवानिवृत्ति की आयु तक के सवालों के जवाब दिए।

कांग्रेस ने भागवत की इस टिप्पणी के लिए उन पर निशाना साधा कि उन्होंने कभी नहीं कहा कि वह सेवानिवृत्त हो जाएंगे या किसी और को 75 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त हो जाना चाहिए। कांग्रेस ने कहा कि एक महीने से अधिक समय में उन्होंने कई ‘विरोधाभासी बयान’ दिए हैं।

कांग्रेस महासचिव एवं संचार प्रभारी जयराम रमेश ने भागवत के बृहस्पतिवार और जुलाई के बयानों के संबंध में खबरों को ‘एक्स’ पर टैग करते हुए एक पोस्ट में कहा, ‘एक महीना, एक व्यक्ति, दो विरोधाभासी बयान।’

कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य प्रमोद तिवारी ने 75 साल की उम्र में सेवानिवृत्त होने के बारे में भागवत के स्पष्टीकरण पर निशाना साधते हुए पूछा कि पर्दे के पीछे ऐसा क्या हुआ कि उन्हें अपना बयान बदलना पड़ा।

कांग्रेस सांसद ने ‘पीटीआई वीडियो’ से कहा, ‘मुझे याद है कि कुछ दिन पहले उन्होंने कहा था कि जब आप 75 साल के हो जाएं, तो आपको अलग हट जाना चाहिए और दूसरों को काम करने देना चाहिए।’

उन्होंने कहा, ‘तो फिर (भाजपा के कद्दावर नेताओं) लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और कलराज मिश्र का क्या दोष था कि 75 साल की उम्र के बाद उन्हें मार्गदर्शक मंडल में भेज दिया गया?’

सेवानिवृत्ति की आयु पर आरएसएस प्रमुख की टिप्पणी के संदर्भ में समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने एक पोस्ट में कहा, ‘न रिटायर होऊंगा, न होने दूंगा। जब अपनी बारी आई, तो नियम बदल दिए गए।’

यादव ने कहा, ‘यह दोहरा मापदंड ठीक नहीं है। जो अपनी बात से पलट जाते हैं, उन पर कोई भरोसा नहीं करता…जो विश्वास खो देते हैं, वे सत्ता खो देते हैं।’

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भागवत की टिप्पणी को लेकर उन पर निशाना साधा और उन पर ‘दोहरी बातें’ करने का आरोप लगाया।

‘पीटीआई वीडियो’ के साथ एक विशेष साक्षात्कार में उन्होंने आरोप लगाया, ‘आरएसएस द्वारा प्रायोजित और समर्थित संगठन ही मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाते हैं। और, वास्तव में, नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत को संस्थागत रूप दिया गया है।’ भागवत के इस सुझाव पर कि जनसंख्या को पर्याप्त और नियंत्रण में रखने के लिए प्रत्येक भारतीय परिवार में तीन बच्चे होने चाहिए, ओवैसी ने आरोप लगाया कि आरएसएस अपनी स्थापना के बाद से लगातार यह ‘झूठ’ फैलाता रहा है कि जिस तरह से देश में मुस्लिम आबादी बढ़ रही है, वह हिंदू आबादी पर कब्जा कर लेगी।

उन्होंने कहा, ‘सच्चाई यह है कि मुसलमानों की कुल प्रजनन दर (टीएफआर) में कमी आई है। इसमें गिरावट किसी भी अन्य धर्म की तुलना में अधिक है।’

एआईएमआईएम प्रमुख ने दावा किया कि जब 1871-72 में पहली जनगणना हुई थी, तब देश में हिंदुओं की आबादी 73 प्रतिशत थी, जबकि मुसलमानों की आबादी 21 प्रतिशत थी। उन्होंने कहा कि 2011 में हिंदुओं की आबादी बढ़कर 79.8 प्रतिशत और मुसलमानों की आबादी 14.23 प्रतिशत हो गई।

दूसरी ओर, मुस्लिम विद्वानों ने इस्लाम और ‘भारत के मुसलमानों’ पर आरएसएस सरसंघचालक के विचारों की सराहना की।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष अरशद मदनी ने भागवत के एकता के आह्वान का स्वागत करते हुए कहा कि दोनों पक्षों (हिंदुओं और मुसलमानों) से गलतफहमियां दूर की जानी चाहिए और ‘उन्हें एक साथ लाने के प्रयास किए जाने चाहिए।’

उत्तर प्रदेश के प्रख्यात मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने आरएसएस प्रमुख की इस्लाम और मुस्लिम समुदाय के बारे में टिप्पणी का स्वागत करते हुए कहा, ‘हमें एक साथ आना चाहिए और अच्छे माहौल में देश को प्रगति के पथ पर ले जाना चाहिए।’

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