आंतरिक उपनिवेश से मुक्ति की छटपटाहट 

Dayanand Roy
12 Min Read

सुधीर पाल

दुनिया की सबसे अमीर ज़मीनों पर बसे लोग गरीब क्यों हैं?

तो लीजिए, असल आंकड़े —

30% सोना — माली, बुर्किना फासो, घाना, तंज़ानिया —सोना नदियों की तरह बहता है, लेकिन लोग गरीबी में तैरते हैं।

65% हीरे – बोत्सवाना, अंगोला, कांगो, सिएरा लियोन में, अरबों डॉलर के हीरे निकाले जाते हैं, लेकिन मज़दूर $1 रोज़ कमाते हैं।

35% यूरेनियम — नाइजर, नामीबिया, साउथ अफ़्रीका में, पेरिस की लाइटें हमारे यूरेनियम से जलती हैं, लेकिन हमारे गांवों में बिजली नहीं।

और तुम पूछते हो — अफ़्रीका गरीब क्यों है? सही सवाल ये है:

अफ़्रीका को इतना अमीर होते हुए गरीब कैसे बनाए रखा गया?

जवाब है — उपनिवेशवाद।

पश्चिमी देशों को ललकारते और देशवासियों के मन में भरोसा जगाते अफ्रीकी देश बुर्कीना फासो के युवा राष्ट्रपति इब्राहिम ट्रोरे की इस वीडियो ने खूब सुर्खियां बटोरीं। लेकिन ऊपर के वाक्यों से यदि बुर्कीना फासो को हटा झारखंड, उड़ीसा, छतीसगढ़ या उत्तर पूर्व के कुछ राज्यों का नाम जोड़ दें तो लगभग ऊपर की ही तस्वीर बनेगी।

युवा राष्ट्रपति इब्राहिम ट्रोरे को अफ्रीकी देश बुर्कीना फासो में मसीहा और तारणहार की तरह देखा जा रहा है। वजह है, उन्होंने कई ऐसे फैसले लिए हैं जिनसे हिंसा, आर्थिक तंगी, भुखमरी झेलते इस अफ्रीकी देश के लोगों को उम्मीद मिली है।क्या झारखंड और अन्य खनिज सम्पन्न राज्यों में स्थिति इससे अलग है?

भारत में खनन उद्योग एक प्रमुख आर्थिक गतिविधि है, जो भारत की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है। खनन उद्योग का जीडीपी में योगदान 2.2% से 2.5% तक है। 2015-16 में खनिज उत्पादन का मूल्य लगभग 2,76,638 करोड़ था, जिसमें पांचवीं अनुसूचित क्षेत्र की हिस्सेदारी 65% रही।

इसके साथ ही खनन से मिलने वाली रॉयल्टी का 88.5% अनुसूचित क्षेत्र होने वाले राज्यों से आता है। फिर भी, दुर्भाग्य यह है कि जनजातीय आबादी इन संसाधनों के मालिक होते हुए भी बेरोजगारी, गरीबी, और असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। वे संसाधनों के दोहन के बावजूद सामाजिक-आर्थिक रूप से सबसे कमजोर बने हुए हैं।

खतरा है खनन

खनन गतिविधियाँ अनुसूचित क्षेत्रों के जनजातीय समुदायों के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरी हैं। देश भर में कुल 2,100 माइंस हैं, जिनमें करीब 1,463 खानें अनुसूचित क्षेत्रों में स्थित हैं। खनन से प्राप्त रॉयल्टी का 88.5% भी इन्हीं राज्यों से आता है, फिर भी स्थानीय जनजातियों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति सबसे अधिक असुरक्षित और कमजोर बनी रहती है।

इसमें हिमाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा के आंकड़े शामिल नहीं हैं। ध्यान रहे कि अनुसूचित क्षेत्रों में खनन गतिविधियों पर व्यवस्थित आंकड़ों का नितांत अभाव है। खनन गतिविधियों से प्राप्त होने वाले राजस्व और मुनाफे का ब्यौरा जुटा पाना थोडा मुश्किल है। ये आंकड़े एक साथ कहीं उपलब्ध नहीं हैं।

एमएमडीआर एक्ट, 2015 खनिज संपदाओं को ‘प्रमुख’और ‘लघु’ खनिज के तौर पर वर्गीकृत करता है। लघु खनिज के अंतर्गत बालू, रेट, पत्थर, गिट्टी,चिकनी मिटटी आदि आता है। केन्द्र सरकार की अधिसूचना के मुताबिक़ जो कुछ लघु खनिज के रूप में अधिसूचित नहीं हैं, वे प्रमुख खनिज माने जायेंगे। वर्ष 2015-16 में खनिज उत्पादन का मूल्य 2,76, 638 करोड़ आंका गया था।

2023-24 के लिए खनिज उत्पादन (परमाणु, ईंधन और लघु खनिजों को छोड़कर) का अनंतिम कुल मूल्य ₹ 1,41,239 करोड़ होने का आँका गया। इसी वित्तीय वर्ष में धात्विक खनिजों का अनंतिम मूल्य ₹1,27,599 करोड़ आँका गया। जो कुल खनिज उत्पादन मूल्य का 90.3% है। इसकी तुलना में, अधात्विक खनिजों का उत्पादन ₹13,640 करोड़ अनुमानित है, जो कुल मूल्य का 9.7% है।

ये आँकड़े वर्ष के समग्र खनिज उत्पादन मूल्य में धात्विक खनिजों की प्रधानता को रेखांकित करते हैं। खनिज उत्पादन में पांचवीं अनुसूचित क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 65 फीसदी है। देश में खनन से मिलने वाली रॉयल्टी संग्रहण का 88.5 फीसदी अनुसूचित क्षेत्र के राज्यों से आता है। चूँकि खनन का जिलावार या प्रखंडवार आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, इसलिए जिलावार या प्रखंडवार खनन गतिविधियों या रॉयल्टी का ब्यौरा संभव नहीं है। केवल राज्यवार आंकड़े ही उपलब्ध हैं।

खनन इलाकों में ज्यादा गरीबी

सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरमेंट ने केन्द्र और राज्य सरकारों से सूचना अधिकार कानून के तहत खनन सम्बन्धी जानकारी मांगी थी। प्राप्त जानकारी के मुताबिक़ देश में 50 प्रमुख खनन जिले हैं। खनन के 50 प्रमुख जिलों में से 27 जिले अनुसूचित क्षेत्र के जिले हैं। विचित्र किन्तु सत्य है कि लगभग 90 फीसदी खनन रॉयल्टी के बाद भी जनजातीय आबादी सबसे ज्यादा असुरक्षित और निर्धन है।  जनजातीय समुदायों के पैरों तले खनिज है और साथ ही संविधान का सुरक्षा कवच भी। बावजूद इसके वे शोषित, उत्पीड़ित और विस्थापित हैं।

सर्वोच्च अदालत ने 25 जुलाई 2024 के कहा, “छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों में खनिजों का ज्यादा भंडार है। इस तरह, इन राज्यों के घेरलू विकास में खनन सेक्टर की भूमिका ज्यादा है। खनिजों से समृद्ध होने के बावजूद इनमें से कई राज्य आर्थिक विकास में पीछे हैं और अर्थशास्त्री इसे ‘संसाधनों का श्राप’ कहते हैं। उदाहरण के लिए झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से कम है। इसलिए, कराधान इन राज्यों के लिए राजस्व के महत्वपूर्ण स्रोतों में से एक है, जो लोगों को कल्याणकारी योजनाएं और सेवाएं प्रदान करने की उनकी (राज्यों की) क्षमता पर असर डालता है।”

उपनिवेश बनाये रखने की राजनीति

देश में उत्पादित कुल खनिजों का लगभग 40% उत्पादन झारखंड में होता है। यहाँ पाये जाने वाले खनिजों की संख्या 30 से भी अधिक है। यहाँ की अर्थव्यवस्था का मूल आधार खनिज पदार्थ एवं उन पर निर्भर उद्योग-धंधे हैं। अनुमानतः सम्पूर्ण भारत के लौह अयस्क का 30% भंडार  झारखण्ड में है। ताँबा उत्पादन में झारखंड देश का अग्रणी राज्य है।

देश का 33% ताँबा यहाँ उत्पादित होता है। लगभग 32% बॉक्साइट उत्पादन कर देश में प्रथम स्थान पर है। यहाँ उच्च कोटि का बॉक्साइट पाया जाता है, जिसमें 52% से 55% तक एल्यूमीनियम होता है। वर्तमान में करीब 350 किलोग्राम सोना का औसत उत्पादन हिन्दुस्तान कॉपर लिमिटेड के मऊ कॉपर प्लाँट (घाटशिला) में प्रति वर्ष होता है, जो ताँबा अयस्क से उप-उत्पाद के रूप में निकाला जाता है।

विडंबना देखिए कि खनिज सम्पन्न होने के बाद भी नीति आयोग ने सबसे ज्यादा गरीबी झारखंड और बिहार में होने का उल्लेख किया है। इस मामले में झारखंड की स्थिति बिहार से तुलनात्मक रूप में थोड़ी बेहतर है। नीति आयोग ने राज्य में गरीबी की स्थिति का आकलन करने के लिए बहुआयामी गरीबी सूचकांक (मल्टी डायमेंशनल पोवर्टी इंडेक्स-एमपीआइ) को आधार बनाया है। इसके तहत किसी परिवार की आर्थिक स्थिति के साथ ही उसके स्वास्थ्य, शिक्षा और रहन-सहन के स्तर को आधार बनाया जाता है।

आयोग ने इस आधार पर झारखंड का आकलन करने के बाद यह नतीजा निकाला है कि यहां गरीबी की तीव्रता 43.95 प्रतिशत है। आयोग की रिपोर्ट में चतरा, साहिबगंज, पश्चिम सिंहभूम, दुमका और पाकुड़ में सबसे ज्यादा गरीबी होने का उल्लेख किया है। रिपोर्ट के अनुसार, पाकुड़ में सबसे ज्यादा 66.2 प्रतिशत गरीबी है।

पश्चिम सिंहभूम में 61.7,साहिबगंज में 60, दुमका में 58.7 और चतरा में 58.4 प्रतिशत गरीबी होने का उल्लेख किया है। सबसे कम गरीबी पूर्वी सिंहभूम में है। इस जिले में 25.8 प्रतिशत गरीबी है. राजधानी रांची इस मामले में दूसरे नंबर पर है, इस जिले में 29.3 प्रतिशत गरीबी है। मालूम हो पश्चिम सिंहभूम लौह अयस्क का हब है और याहन की 60 फ़ीसदी आबादी गरीबी और कुपोषण में जीने को बाध्य है। 

झारखंड सरकार के खान विभाग के आंकड़ों की लिहाज से पश्चिम सिंहभूम में सर्वाधिक 2814.45 करोड़ रुपये की वसूली हुई है। यहां लौह अयस्क से 90 प्रतिशत राजस्व की प्राप्ति हुई है। वहीं, धनबाद में 1945.18 करोड़ रुपये की वसूली हुई है। यहां भी 90 प्रतिशत से अधिक राजस्व कोयला से प्राप्त होता है। खान विभाग ने वित्तीय वर्ष 2024-25 में कुल 11848.15 करोड़ रुपये की वसूली की है।

इसमें खनन भूमि पर लगाये गये सेस करीब 1380 करोड़ रुपये मिले हैं। वित्तीय वर्ष 2025-26 में खान विभाग ने 21900 करोड़ रुपये राजस्व वसूली का लक्ष्य रखा है। विभाग का मानना है कि सेस की दर बढ़ायी गयी है। वहीं, पावर प्लांटों को दिये जाने वाले कोयले पर भी बाजार दर से रॉयल्टी की वसूली होगी। इससे राजस्व दोगुना हो जायेगा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद झारखंड खनिज धारित भूमि उपकर अधिनियम 2024 बना। इसमें मीट्रिक टन के हिसाब से उपकर लगाने का प्रावधान है। कोयले और लौह-अयस्क के लिए 100 रुपए प्रति मीट्रिक टन के हिसाब से उपकर लगाने का प्रावधान है। वहीं, बॉक्साइट पर यह दर 70 रुपए प्रति मीट्रिक टन, चूना पत्थर और मैगनीज अयस्क पर 50 रुपए प्रति मीट्रिक टन होगी। इसके अलावा अन्य खनिजों के लिए हर टन खनिज पर चुकाई गई रॉयल्टी का 50 प्रतिशत सेस लगेगा। 

लेकिन क्या राजस्व वसूली बढ़ जाने से यहाँ के आदिवासियों और मूलवासियों की स्थिति बेहतर हो जाएगी। उत्तर ना होगा। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने बकाये 1.36,000 करोड़ के बकाये की मांग तेज कर दी है। झारखंड सहित लगभग हर खनिज सम्पन्न राज्यों की राजनीति की धुरी खनन और इसपर आधारित वैध-अवैध कारोबार है।

यही कारोबार सत्ता का समीकरण बनाता और बिगाड़ता है। नीतियाँ यही तय करता है और यही लाबी कॉर्पोरेट के हितों को आदिवासी और मूलवासियों के हितों से ऊपर रखने को सरकार को बाध्य करता है और सरकार अपने हिसाब से चलता है।

इसलिए आदिवासी मुख्यमंत्री होने ना होने का कोई असर इन सम्पन्न राज्यों के आदिवासियों और मूल वासियों की सेहत पर नहीं पड़ता है। आंतरिक उपनिवेशवाद का यह नायाब मॉडल है जो सफलता से फल-फूल रहा है। झारखंड को बुर्कीना फासो के युवा राष्ट्रपति इब्राहिम ट्रोरे की तलाश है!

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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