ग्रेट निकोबार में विकास के विरोध में नहीं आदिवासी, लेकिन परियोजना की जानकारी नहीं : आशा लकड़ा

Dayanand Roy
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नयी दिल्ली: राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (एनसीएसटी) की सदस्य आशा लकड़ा ने कहा कि ग्रेट निकोबार में जनजातीय समुदाय विकास के विरोध में नहीं हैं, लेकिन द्वीप पर प्रस्तावित विशाल बुनियादी ढांचा परियोजना के बारे में उनके पास पर्याप्त जानकारी नहीं है।

इस परियोजना का नाम ‘ग्रेट निकोबार का समग्र विकास’ है और इसमें 160 वर्ग किलोमीटर से अधिक भूमि पर एक ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह, एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, एक टाउनशिप और एक बिजली संयंत्र का निर्माण शामिल है। इसमें लगभग 130 वर्ग किलोमीटर का प्राचीन वन क्षेत्र शामिल है, जिसमें अनुसूचित जनजाति में शामिल निकोबारी और एक विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) शोम्पेन रहते हैं, जिनकी अनुमानित जनसंख्या 200 से 300 के बीच है।


लकड़ा ने एक साक्षात्कार में कहा कि उन्होंने जनजातीय समुदायों की समस्याओं की समीक्षा के लिए पांच से सात जून तक अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में एनसीएसटी टीम का नेतृत्व किया।


उन्होंने कहा कि आयोग ने ग्रेट अंडमानी, जरावा, निकोबारी और शोम्पेन सहित सभी जनजातीय समूहों के प्रतिनिधियों के साथ एक विस्तृत बैठक की।


लकड़ा ने कहा, ‘‘हमने सभी से मुलाकात की…हमने ग्रेट निकोबार द्वीप में रह रहे शोम्पेन और निकोबारी दोनों समुदायों से बातचीत की। ज्यादातर लोगों को परियोजना के बारे में कुछ नहीं पता था। वे अपनी जिंदगी में व्यस्त हैं…उन्होंने द्वीपों के बीच यात्रा करने के लिए और नौकाओं की मांग की।’’


ग्रेट निकोबार के निवासियों के साथ अपनी बातचीत के बारे में पूछे जाने पर लकड़ा ने कहा, ‘‘उनके पास कोई और समस्या नहीं है। उन्हें बस विकास चाहिए… बेहतर परिवहन, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं। यही उन्होंने हमसे कहा। सेंटिनली लोगों को छोड़कर सभी ने यही कहा। वे विकास के पक्ष में हैं।’’


लकड़ा ने कहा, ‘‘वे रोजगार और अपनी वित्तीय स्थिति में सुधार चाहते हैं।’’


हालांकि, ‘लिटिल एंड ग्रेट निकोबार ट्राइबल काउंसिल’ के अध्यक्ष बरनबास मंजू ने फोन पर बताया कि काउंसिल को बैठक में आमंत्रित नहीं किया गया था और उन्हें स्थानीय मीडिया के माध्यम से इसकी जानकारी मिली।


यह पूछे जाने पर कि क्या आयोग ने परियोजना से संबंधित वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) के उल्लंघन की शिकायतों पर गौर किया है, इस पर लकड़ा ने कहा, ‘‘एफआरए उल्लंघन की एकमात्र ऐसी शिकायत सामने आई है जिसमें गैर-आदिवासी बाहरी लोग शामिल हैं, जो निर्माण कार्य के लिए आते हैं, एसटी महिलाओं से विवाह करते हैं और आदिवासी भूमि पर बस जाते हैं।’’


उन्होंने कहा कि इससे गैर-आदिवासियों को एफआरए के तहत संरक्षित भूमि पर वास्तविक नियंत्रण प्राप्त करने की अनुमति मिल जाती है।


इस महीने की शुरुआत में मीडिया से बातचीत में केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्री जुएल ओरांव ने कहा था कि उनका मंत्रालय प्रस्तावित परियोजना के संबंध में जनजातीय समुदायों द्वारा उठाई गई आपत्तियों की जांच कर रहा है।

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