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पूर्णिया की धरती आबाद रहे

by Dayanand Roy

विनीत कुमार

पूर्णिया कभी जाना नहीं हुआ लेकिन बहुत ही अपनी सी जगह महसूस होती है। इतनी अपनी कि उम्मीद सी बंधती है कि वहां कभी जाना हुआ तो पहुंचते ही आसपास के लोग कहेंगे- आ गए ! रूको अभी-अभी कूटा हुआ बासमती चूड़ी लेकर आते हैं। साथ में चक्की गुड खाओगे या तिलकुट ?

एक तो रेणु ने मेरीगंज-पूर्णिया को इस अंदाज़ में हमारे बीच पेश किया कि मैला आंचल पढ़वाले पाठकों का इस देश में तीन घर हो जाया करता है- नानीघर,दादीघर और रेणु घर। तीनों घरों के अपना घर होने का दावा और एक वक़्त तक वैसी ही आत्मीयता और दूसरा

पूर्णिया-भागलपुर हम भले ही कभी न गए हों लेकिन सालोंभर वहां की कुछ न कुछ चीज़ें थाली-कटोरी में आती रही. जिस जगह की चीज़ हमारे खाने में शामिल रहती हैं, हम उस जगह में किसी न किसी तरह से शामिल हो ही जाते हैं.

दीपावली बीतती कि पूर्णिया-भागलपुर का चूड़ा शब्द सुनाई देने लग जाता। पापा को सब्ज़ी कभी ख़ास पसंद नहीं आयी तो दीपावली से मकर संक्रांति तक रात के खाने में नियम से रात में पूर्णिया-भागलपुर का बासमती चूड़ा और दूध खाया करते। चूड़े की मात्रा भले ही दो चम्मच क्यों न हो. उन्हें ये इतना प्रिय होता कि स्वीट डिश की जगह यही खाया करते।

हमारे लिए ये बासमती चूड़ा फक्का मारने की चीज़ होती. फक्का मारना, खाने से अलग ढंग की बात है। अमूमन कोई भी चीज़ बिना चम्मच-कटोरी के न खाने की आदत, बासमती-कतरनी चूड़ा के आगे पीछे छूट जाती. फक्का मारना मतलब आते-जाते सीधे उठाओ और मुँह में डाल लो।

शाम के वक़्त स्कूल से लौटकर कई बार हम ऐसे ही फक्का मारकर बासमती-कतरनी फक्का मारकर खाते और वही खाकर एकदम से सो जाते तो माँ उठाती- तुम दू फक्का चूड़ा खाके ही जाड़ा का एतना बड़ा रात काटेगा बच्चा ! कम से एक रोटी खा लो. नीम बेहोशी हालत में हम कई बार लाख कोशिश के बाद नहीं उठते और वही चूड़ा डिनर हो जाता.

पूर्णिया-भागलपुर के इस बासमती चूड़ा की ख़ूशबू मुझे बहुत पसंद है. मेरे दोस्त ने जब ये चूड़ा मुझे दिया जो कि सीधे पूर्णिया से चलकर आया तो मैंने इन्फ्यूजर की स्टिक निकाल वापस डिब्बे में रख दिया और टेबल पर भर वोल चूड़ा रख दिया. इसकी ख़ुशबू में बचपन की सुंदर यादें छिपी महसूस होती रही.

कुछ भी फांकने की आदत अब चली गयी है तो वैसी कोशिश भी नहीं की। एक छोटे वोल में चूड़ा निकाला और पूर्णिया से आए तिलकुट का एक टुकड़ा लेकर खाने बैठ गया। अभी डिनर में बहुत टाइम है. अब बचपन जैसी नीम बेहोशी नींद नहीं आती तो इसी को खाकर तो नहीं सो जाएंगे लेकिन इस मौसम ये मुझे सबसे आसान और मन को रुचनेवाला शाम का नाश्ता लगता है।

कोई तामझाम नहीं, बस थोड़ा सा निकालो और कच्चा खाने लग जाओ। धीरे-धीरे ऐसी मिठास आने लगती है कि गुड़-तिलकुट..किसी भी चीज़ की ज़रूरत महसूस नहीं होती।

पूर्णिया की धरती आबाद रहे. वहां खूब बासमती की फसलें लहलहाए और हर साल कोई न कोई सहृदय दिल्ली को अपनी सौगात भेजे. रेणु घर में कम से कम दुःख और खूब-खूब खुशहाली हो।

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