
प्रवीण बागी

राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की राजनीति लंबे समय से सामाजिक न्याय के विमर्श, मंडल की विरासत और लालू प्रसाद यादव की करिश्माई नेतृत्व शैली के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन जैसे-जैसे पार्टी अपने संस्थापक के बाद के युग में प्रवेश कर रही है, भीतर ही भीतर नेतृत्व, भूमिका और दिशा को लेकर खींचतान तेज़ होती दिख रही है।
यह उठा-पटक सिर्फ व्यक्तियों के बीच नहीं, बल्कि पीढ़ियों, राजनीतिक शैली और संगठनात्मक संस्कृति के बीच भी है। लालू प्रसाद यादव राजद के लिए सिर्फ नेता नहीं, बल्कि विचार और पहचान हैं। उनकी गैरमौजूदगी या सीमित सक्रियता में पार्टी का संचालन स्वाभाविक रूप से अगली पीढ़ी पर आ टिकता है।
ऐसे में उत्तराधिकार का प्रश्न—कौन, कैसे और किस संतुलन के साथ—पार्टी के भीतर असहजता पैदा करता है। तेजस्वी यादव के नेतृत्व को एक बड़ा वर्ग स्वीकार करता है, लेकिन पुराने नेताओं और अन्य महत्वाकांक्षी चेहरों के बीच भूमिका-विभाजन पर असंतोष भी उभरता रहा है।
राजद की शक्ति हमेशा से जमीनी नेटवर्क और अनुभवी नेताओं से आई है। परंतु बदलती चुनावी राजनीति, मीडिया की भूमिका और प्रशासनिक अपेक्षाओं के दौर में नई पीढ़ी अधिक पेशेवर, मुद्दा-आधारित और तेज़ निर्णय चाहती है।
यहीं टकराव पैदा होता है—जहां पुराने नेता सम्मान और परामर्श की अपेक्षा रखते हैं, वहीं युवा नेतृत्व निर्णायक भूमिका चाहता है। यदि यह संतुलन साधा नहीं गया, तो असंतोष संगठनात्मक कमजोरी में बदल सकता है।
राजद पर अक्सर व्यक्तित्व-केंद्रित राजनीति का आरोप लगता रहा है। अंदरूनी उठा-पटक इसी का परिणाम भी है। मजबूत संगठनात्मक ढांचा, स्पष्ट आंतरिक लोकतंत्र और पारदर्शी निर्णय-प्रक्रिया के अभाव में गुटबाज़ी स्वाभाविक हो जाती है।
टिकट वितरण, गठबंधन में हिस्सेदारी और रणनीतिक फैसलों पर असहमति इसी खालीपन को उजागर करती है। बिहार की राजनीति गठबंधनों पर टिकी है।
बाहर की राजनीति जितनी जटिल होती है, उतना ही दबाव भीतर पड़ता है। सहयोगियों के साथ तालमेल बिठाने के लिए नेतृत्व को लचीला होना पड़ता है—और यही लचीलापन भीतर कुछ नेताओं को असहज करता है। कौन-सा समझौता ‘रणनीति’ है और कौन-सा ‘समर्पण’—इस बहस में अंदरूनी मतभेद तीखे हो जाते हैं।
राजद के लिए यह क्षण आत्ममंथन का है। पार्टी को स्पष्ट नेतृत्व संरचना, जिम्मेदारियों का विभाजन और आंतरिक संवाद के मंच मजबूत करने होंगे। लालू प्रसाद यादव की विरासत का सम्मान करते हुए नई पीढ़ी को आगे बढ़ने की जगह देनी होगी—लेकिन पुराने नेताओं के अनुभव को दरकिनार किए बिना। सामाजिक न्याय का मूल एजेंडा तभी प्रभावी रहेगा, जब संगठन भीतर से एकजुट और लोकतांत्रिक होगा।
राजद की अंदरूनी उठा-पटक किसी एक व्यक्ति या घटना तक सीमित नहीं है; यह संक्रमणकाल की राजनीति का स्वाभाविक परिणाम है। सवाल यह नहीं कि मतभेद हैं या नहीं, बल्कि यह है कि पार्टी उन्हें कैसे सुलझाती है। यदि संवाद, संगठन और दृष्टि स्पष्ट रही, तो यही संघर्ष राजद को नया रूप दे सकता है—अन्यथा यह कमजोरी बनकर विरोधियों को अवसर देगी।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।


