दयानंद राय
धाकड़ और जमीनी पत्रकार शरद शर्मा जब एनडीटीवी में थे, तब से मैं उन्हें देखता आ रहा हूं। बहुत कायदे की पत्रकारिता वे करते दिखे। जब उन्होंने एनडीटीवी छोड़ी और बाद में छोड़ने का कारण बताया तब भी मैंने उन्हें देखा और अब शरद शर्मा ऑन ग्राउंड देखकर उनकी पत्रकारिता का तो मैं कायल हो गए।
भारत एक ऐसा देश है जहां आर्थिक असमानता चरम पर है। करीब डेढ़ अरब की आबादी वाला हमारा देश ऐसा देश है जहां के करीब 80 करोड़ लोग पांच किलो अनाज पर गुजर-बसर करते हैं।
ऐसे में देश में जमीनी पत्रकारिता का स्कोप अनलिमिटेड है पर मुख्यधारा के चैनलों से वह गायब है। पत्रकार या तो पॉलिटिकल एनालिसिस में अपनी ताकत खपा रहे हैं या फिर क्राइम और दूसरी खबरों में।
चैनलों में लगातार बहस हो रही है लेकिन जनसाधारण के वह किसी काम की नहीं। दिल्ली विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा ने दिल्ली की जनता से वादा किया कि गरीबों को जहां झुग्गी वहां मकान देंगे, पर अब हालत ये है कि गरीबों के घर तोड़े जा रहे हैं।
ठंड के मौसम में उन्हें उनके घर से बेघर किया जा रहा है। सत्ता सिर्फ दिल्ली में ही ऐसा नहीं कर रही बल्कि बिहार से लेकर झारखंड में भी गरीबों पर सत्ता का बुलडोजर चल रहा है।
बेबस लोग सत्ता के बुलडोजर के नीचे अपना घर गंवाकर कड़ाके की ठंड में आसमान के नीचे जिंदगी गुजार रहे हैं। वहीं जिन्होंने उनका वोट लिया, उन्हें उनके हाल से कोई मतलब नहीं है।
ठंड में खुले आसमान के नीचे समय गुजार रही परिवारों की बेबसी किसी मीडिया के लिए कोई खबर नहीं है। लेकिन शरद शर्मा उनके साथ मजबूती से खड़े नजर आते हैं। उनके मुद्दे के लिए यू ट्यूब की पत्रकारिता में जगह बनाते हैं। उनका दुख दर्द दिखाते हैं।
सवाल ये है कि मुख्यधारा की मीडिया के लिए यह खबर क्यों नहीं है। शरद शर्मा इस सवाल के जवाब में पैदा हुए वैक्यूम को तोड़ते नजर आते हैं।
इसलिए, शरद शर्मा की पत्रकारिता और उन्हें सलाम करने को जी चाहता है। उन जैसे पत्रकारों से ही लोकतंत्र में बेहतरी की उम्मीदें जिंदा हैं।

