महेश सिन्हा
कन्हैया और पप्पू को मंच पर जगह नहीं मिलने से युवा कार्यकर्ताओं में रोष
पटना : लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में सोमवार को पटना में संपन्न विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ की मतदाता अधिकार यात्रा से कांग्रेस को सबसे अधिक लाभ हुआ। बिहार में पहली बार हुए इस तरह के कार्यक्रम ने चार दशक से सूबे में हाशिए पर रही कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं में जान ला दी है।
इस यात्रा ने कांग्रेस के लिए संजीवनी का काम किया और पार्टी में जोश भरने के साथ ही बिहार में राहुल के नेतृत्व की स्वीकार्यता बढ़ाई है।कांगेस अब बिहार में राजद के पिछलग्गू होने की अपनी छवि तोड़ी है। बिहार में अब वह अगली कतार में नजर आने लगी है और ड्राइविंग सीट पर बैठने की जुगत में है।इससे राजद के साथ उसके रिश्तों में कुछ खटास की खबर भी आने लगी है। इस बीच
मतदाता अधिकार यात्रा के समापन कार्यक्रम में पूर्णिया सांसद पप्पू यादव और कांग्रेस के युवा नेता कन्हैया कुमार को मंच पर जगह नहीं मिलने को लेकर राजनीति गर्मा गई है। कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी, तेजस्वी यादव, मुकेश सहनी, डी.राजा, हेमंत सोरेन और दीपंकर भट्टाचार्य जैसे इंडिया गठबंधन के दिग्गज मंच पर थे, लेकिन पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव एवं कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार मंच के नीचे ही रह गए।
इस दौरान पप्पू यादव और कन्हैया कुमार को मंच पर चढ़ने से रोक दिया गया। इसको लेकर बिहार में सियासत गर्मा गई है। जानकारों की मानें तो पप्पू यादव और कन्हैया कुमार की अनदेखी तेजस्वी यादव पर भारी पड़ सकती है।
कन्हैया कुमार और पप्पू यादव को मंच पर जगह नहीं देने के पीछे की वजह राजद की नाराजगी बताई जा रही है। राजद नहीं चाहती कि कांग्रेस में वैसे नेताओं का उभार हो जो आगे चलकर तेजस्वी के लिए चुनौती बने। जबकि राहुल गांधी की मतदाता अधिकार यात्रा में पप्पू यादव और कन्हैया कुमार साथ रहे। लेकिन तेजस्वी यादव की मौजूदगी की वजह से उन दोनों को ज्यादा तवज्जो नही दी गई।
सियासत के जानकारों की मानें तो राहुल गांधी ने जिस तरह से कांग्रेस को संगठन के स्तर पर मजबूत करने की कोशिश की और बिहार में मतदाता अधिकार यात्रा सहित कई मौकों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है, ऐसे माना जाने लगा है कि वे राज्य में कांग्रेस को अलग पहचान देने की तरफ बढ़ रहे हैं। अब वह ’हां’ में ’हां’ मिलाने के मूड में नहीं हैं। लेकिन कन्हैया और पप्पू यादव के साथ जो हुआ उसने स्थिति साफ कर दी है। इसका असर टिकट बंटवारे में भी दिखेगा। कन्हैया कुमार को राहुल गांधी की टीम का नेता माना जाता है।
उनको समय-समय पर पार्टी जिम्मेदारियां दे रही है। कांग्रेस की युवा पीढ़ी के नेताओं में कन्हैया की डिमांड सबसे अधिक है। बिहार में कांग्रेस के पास कन्हैया के अलावा अभी ऐसा कोई युवा नेता नहीं है, जो लंबी दूरी का घोड़ा बन सके। बिहार में जितनी जरूरत कांग्रेस को कन्हैया की है, उतनी ही जरूरत कन्हैया को कांग्रेस की भी है। कन्हैया कुमार युवा हैं। वहीं राजद की कोशिश युवाओं की सियासत में तेजस्वी को प्रमुख चेहरे के तौर पर स्थापित करने की है और इस कोशिश में कन्हैया कुमार चुनौती बन सकते हैं।
तेजस्वी और उनकी पार्टी कन्हैया को कथित तौर पर पसंद नहीं करती, तो उसके पीछे इन सभी फैक्टर्स के साथ ही मुस्लिम समुदाय के बीच लोकप्रियता भी वजह हो सकती है। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाकपा ने कन्हैया कुमार को बेगूसराय सीट से गिरिराज सिंह के खिलाफ चुनाव मैदान में उतारा था। तब गठबंधन के बावजूद राजद ने अपना उम्मीदवार दे दिया था।
वहीं, 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस कन्हैया के लिए बेगूसराय सीट चाहती थी, लेकिन मिली नहीं। मजबूरन कांग्रेस को उन्हें उत्तर पूर्वी दिल्ली सीट से उतारना पड़ा। कन्हैया कुमार की अगुवाई में पिछले दिनों हुई ‘पलायन रोको, नौकरी दो’ पदयात्रा से भी तेजस्वी और उनकी पार्टी असहज नजर आई थी। वहीं, पप्पू यादव की बात करें तो पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने लालू यादव से मुलाकात की थी। लालू यादव ने उनसे अपनी पार्टी का राजद में विलय करने और मधेपुरा सीट से चुनाव लड़ने के लिए कहा था। पप्पू यादव पूर्णिया सीट से मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे थे। दरअसल, कोसी-सीमांचल के इलाके में पप्पू यादव की अच्छी पकड़ मानी जाती है।
कोसी नदी के किनारे नेपाल और बांग्लादेश की सीमा के करीब बसे पूर्णिया, अररिया, सुपौल, मधेपुरा, सहरसा, किशनगंज और कटिहार के इलाके आते हैं। इनकी राजनीतिक ताकत का अंदाजा इस बात से भी लगता है कि वो कई बार निर्दलीय विधानसभा से लेकर लोकसभा चुनाव तक जीत चुके हैं। मुस्लिम और यादव बाहुल्य कोसी और सीमांचल के बेल्ट में पप्पू यादव मजबूत पकड़ रखते हैं।
मुस्लिम-यादव समीकरण राजद की सियासत का भी आधार माना जाता है। तेजस्वी यादव को पप्पू पसंद नहीं हैं, तो उसके पीछे यादव पॉलिटिक्स की पिच पर लालू यादव की छाया से बाहर निकल खुद को स्थापित करने की उनकी चाहत भी वजह बताई जाती है। बिहार जातीय सर्वे-2023 के आंकड़े के मुताबिक, बिहार में मुस्लिमों के बाद सबसे ज्यादा आबादी यादव समाज की 14.26 फीसदी है।
पप्पू यादव और लालू यादव दोनों इसी समाज से आते हैं। लालू यादव तेजस्वी यादव को अपनी विरासत सौंप चुके हैं। जबकि, पप्पू यादव की अपनी स्वतंत्र पहचान हैं। तेजस्वी महागठबंधन की तरफ से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। ऐसे में लालू परिवार नहीं चाहता कि कोई दूसरा यादव नेता आसपास रहे। 2024 लोकसभा चुनाव में पप्पू यादव ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने की कोशिश की, लेकिन राजद ने सीट नहीं दिया। उसने जदयू से राजद में आईं बीमा भारती को टिकट दिया। इसके खिलाफ पप्पू यादव निर्दलीय लड़े और जीते। बताया जा रहा है कि इससे बढ़ी तल्खी अब तक कम नहीं हुई है।
बिहार में अभी राजद गठबंधन का नेतृत्व कर रहा है और तेजस्वी यादव 2025 के चुनाव में मुख्यमंत्री चेहरा बनना चाहते हैं। सियासत के जानकारों का कहना है कि इस स्थिति में राजद, पप्पू यादव और कन्हैया कुमार जैसे नेताओं को मंच पर जगह देकर संभावित प्रतिद्वंद्वियों को बढ़ावा नहीं देना चाहती है। वहीं, राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की यह कोशिश है कि वह बिहार में खुद को अधिक सशक्त और नेतृत्वकारी दिखाए। इस प्रक्रिया में पुराने दौर नेताओं को किनारे किया जा रहा है।
लेखक न्यूजवाणी बिहार के संपादक हैं।
